Assembly Election: जामा विधानसभा ने शिबू सोरेन को दी पहचान, परिवार के सदस्यों को बनाया विधायक, इस सीट पर प्रत्याशी तय करना भाजपा के लिए बनी चुनौती

    Assembly Election: जामा विधानसभा ने शिबू सोरेन को दी पहचान, परिवार के सदस्यों को बनाया विधायक, इस सीट पर प्रत्याशी तय करना भाजपा के लिए बनी चुनौती

    Jharkhand Assembly Election 2024: अभी झारखंड विधान सभा चुनाव की घोषणा नहीं हुई है लेकिन कभी भी चुनाव की डुगडुगी बज सकती है. इसको लेकर सभी राजनीतिक दल अपनी अपनी तैयारियां तेज कर दी है. नेताओं के बीच जुबानी जंग जारी है. आरोप प्रत्यारोप के बीच आज हम बात कर रहे हैं दुमका जिला के उस विधान सभा क्षेत्र की जिसने झमुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन को संताल परगना प्रमंडल में एक नई पहचान दी. यहां की जनता ना केबल शिबू बल्कि उनके बड़े पुत्र दुर्गा सोरेन और बड़ी पुत्रबधू सीता सोरेन को जीत का सेहरा पहना कर विधान सभा पहुचाया. 1980 से 2019 तक इस सीट पर तीर धनुष और झामुमो का दबदबा कायम रहा. हम बात कर रहे हैं जामा विधान सभा क्षेत्र की. बदले राजनीतिक माहौल में यह सीट हॉट सीट बनने वाला है.

    झारखंड विधान सभा के लिए निर्वाचन क्षेत्र संख्या 11 दुमका जिला का जामा विधान सभा है, जो अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. यह विधान सभा दुमका लोकसभा का हिस्सा है जिसमें रामगढ़ और जामा थाना शामिल है. वर्ष 2019 के विधान सभा चुनाव में मतदाताओं की संख्या 2,05,913 थी, जिसमें 1,43,591 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था.

    1976 से 2019 तक के चुनाव में इस सीट पर झामुमो और सोरेन परिवार का रहा है दबदबा

    1976 से 2019 तक के जामा विधान सभा के चुनाव परिणाम को देखें तो आदिवासी बहुल इस सीट पर झामुमो का दबदबा रहा है. 1967 में निर्दलीय प्रत्यासी के रूप में एम हांसदा विजयी हुए थे. उसके बाद 1969, 1972 और 1977 में कांग्रेस पार्टी के मदन बेसरा ने जीत की हैट्रिक लगाया. 1980 में इस सीट पर पहली बार झामुमो प्रत्याशी दीवान बेसरा ने जीत दर्ज की. उसके बाद 2000 के चुनाव तक लगातार झामुमो जीत दर्ज करती रही. इस दरम्यान चेहरा बदलते रहा लेकिन सिम्बल तीर धनुष ही रहा. झारखंड का सबसे बड़ा राजनीतिक घराना सोरेन परिवार का दबदबा इस सीट पर कायम रहा. 1985 में शिबू सोरेन यहां से चुनाव जीत कर विधान सभा पहुचे थे. 1990 में सोरेन परिवार से अलग मोहरिल मुर्मू ने झामुमो के टिकट पर जीत दर्ज की. 1995 और 2000 क चुनाव में शिबू सोरेन के बड़े बेटे दुर्गा सोरेन यहां के विधायक निर्वाचित हुए.

    2005 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी सुनील सोरेन ने रोका था झामुमो का विजय रथ

    जामा सीट से झामुमो के विजय रथ को वर्ष 2005 में भाजपा ने रोका. भाजपा प्रत्याशी के रूप में सुनील सोरेन जामा के विधायक चुने गए. लेकिन 2009 में यह सीट एक बार फिर से झामुमो के कब्जे में चली गयी. 21 मई 2009 को दुर्गा सोरेन की मौत के बाद उनकी पत्नी सीता सोरेन 2009 के विधान सभा चुनाव में जीत दर्ज की. सोरेन परिवार की बड़ी बहू सीता सोरेन ने 2014 और 2019 के विधान सभा चुनाव में जीत दर्ज कर जीत की हैट्रिक लगाई.

    बदल गए हैं राजनीतिक हालात, झामुमो के टिकट पर 3 टर्म विधायक बनने वाली सीता सोरेन ने थाम लिया है भाजपा का दामन

    लेकिन वर्तमान समय में यहां की राजनीतिक परिस्थिति बदली हुई है. लोकसभा चुनाव के पूर्व शिबू सोरेन की बड़ी पुत्रवधु सीता सोरेन ने पार्टी और परिवार से बगावत कर भाजपा का दामन थाम लिया. उन्होंने विधान सभा की सदस्यता से भी त्याग पत्र दे दिया. भाजपा ने उन्हें दुमका लोक सभा सीट से पार्टी प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा, लेकिन सीता सोरेन को पराजय का सामना करना पड़ा.

    विधान सभा चुनाव में टिकट बंटवारा भाजपा के लिए होगी अग्नि परीक्षा, कई दावेदार मैदान में

    अब जबकि विधान सभा चुनाव में चंद महीने ही शेष बचे हैं तो एक बार फिर से जामा सीट पर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गयी है. दुमका जिला में भाजपा में घमासान छिड़ा हुआ है. लगभग एक महीने पूर्व पार्टी जिलाध्यक्ष के खिलाफ बगावत का झंडा जामा के कार्यकर्ताओं ने बुलंद किया था, जिसकी आग कई प्रखंडों तक पहुच गयी. अंतर्कलह का पाटने के लिए जिस दिन प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी दुमका के अग्रसेन भवन में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर रहे थे, उस दिन भी जामा में भाजपा का एक गुट बैठक कर जिलाध्यक्ष को हटाने की मांग कर रहे थे. और तो और पिछले हफ्ते जब राय सुमारी चल रही थी तो विरोध को देखते हुए प्रभारी और सह प्रभारी को कार्यक्रम छोड़ कर निकाल जाना पड़ा. इस हालत में टिकट बटबारे को लेकर सबसे ज्यादा माथा पच्ची भाजपा को करनी पड़ेगी. एक तो पहले से ही यहां कई दावेदार हैं, बदले राजनीतिक हालात में उसकी संख्या और बढ़ गयी है. झामुमो के टिकट पर सीता सोरेन 3 टर्म की विधायक रह चुकी है. लोकसभा चुनाव हारने के बाद सीता सोरेन एक बार फिर चाहेगी कि जामा सीट से विधान सभा चुनाव लड़े. साथ ही सीता सोरेन अपनी बड़ी बेटी की राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करना चाहेगी. सांसद रहते लोक सभा का टिकट देकर वापस लेने के बाद सुनील सोरेन की दावेदारी भी जामा सीट पर मजबूत मानी जा रही है. वह 2005 में दुर्गा सोरेन को पराजित कर विधायक रह चुके हैं. वहीं सूत्रों की माने तो लोक सभा का टिकट वापस लेते वक्त पार्टी आलाकमान ने इन्हें विधान सभा चुनाव में जामा सीट से प्रत्याशी बनाने का भरोशा दिया है. इसके अलावे कई ऐसे नेता और कार्यकर्ता हैं जो टिकट की आश में वर्षों से पार्टी का झंडा बुलंद करते आ रहे हैं. ऐसी स्थिति में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सीट से भाजपा के टिकट पर सोरेन परिवार का कोई सदस्य चुनाव लड़ते हैं या फिर पार्टी किसी और को मौका देती है.

    सोरेन परिवार का रहा दबदबा, फिर भी नहीं हो पाया अपेक्षित विकास

    जामा विधानसभा दुमका लोक सभा क्षेत्र में आता है. इस नाते कह सकते हैं कि लंबे अर्से से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व शिबू सोरेन और उनके परिवार के सदस्य करते रहे. इसके बाबजूद क्षेत्र का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया है. उद्योग विहीन इस क्षेत्र में रोजगार के साधन नहीं है. किसानों के खेतों तक पानी नहीं पहुँच पाया है. उच्च शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं है. सड़क और स्वास्थ्य सुविधा बदहाल है. भाजपा का दामन थामने के बाद सीता सोरेन ने इसके लिए हेमंत सोरेन को जिम्मेदार ठहराया था. 

    रिपोर्ट: पंचम झा 


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