लेकिन सवाल है कि आखिर असीम मंडल नक्सली बना कैसे. पुलिस के मुताबिक, 1980 के दशक में छात्र जीवन के दौरान वह नक्सली गतिविधियों के संपर्क में आया. इसके बाद वह पीपुल्स वार ग्रुप से जुड़ गया.
2004 में भाकपा माओवादी के गठन के बाद उसकी संगठन में भूमिका और बढ़ गई. पश्चिम बंगाल के जंगलमहल से लेकर झारखंड के सारंडा और कोल्हान तक उसकी सक्रियता रही. 2010 में उसे पश्चिम बंगाल स्टेट कमेटी का सचिव बनाया गया. 2011 में माओवादी नेता किशनजी के मारे जाने के बाद असीम मंडल झारखंड चला गया. लंबे समय तक सारंडा के जंगलों में सक्रिय रहा. बाद में वह माओवादी संगठन की सेंट्रल कमेटी का सदस्य भी बना.
अब बात उसकी गिरफ्तारी की.
पुलिस को खबर मिली थी कि असीम मंडल सारंडा के जंगल से बाहर निकला है. इसके बाद एसटीएफ ने उसकी तलाश शुरू की. उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी गई. आखिरकार 17 सितंबर को पूर्व मेदिनीपुर के पोटाशपुर में पुलिस ने उसे पकड़ लिया.
पुलिस के मुताबिक, असीम मंडल के पास से करीब 95 हजार रुपये नकद मिले हैं. इसके अलावा पेन ड्राइव, कुछ चिट्ठियां और दस्तावेज भी बरामद किए गए हैं.
असीम मंडल की गिरफ्तारी में उसकी बीमारी और आर्थिक तंगी भी अहम वजह बनी. बढ़ती उम्र के साथ वह स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रहा था. जंगल में लगातार ठिकाना बदलना और पैदल सफर करना भी उसके लिए मुश्किल हो रहा था.
बताया जा रहा है कि आर्थिक जरूरत के चलते वह अपने ससुराल और कुछ परिचितों के संपर्क में आया था. इसी दौरान पुलिस को उसकी लोकेशन का सुराग मिला.
अब पुलिस उससे पूछताछ कर रही है. उसके पुराने मामलों और नक्सली नेटवर्क से जुड़े कई सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं.
