गुमला में पितृपक्ष में नदियों पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, पितरों को किया तर्पण

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Digital News Desk • October 4, 2026

गुमला के रायडीह में मंझटोली में शंख नदी में भाद्रपद पूर्णिमा के साथ ही पितृपक्ष की शुरुआत हो गई है। पितृपक्ष के दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए नदी, तालाब एवं अन्य जलाशयों में तर्पण कर रहे हैं। झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित बाला नदी में भी प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर विधि-विधान से अपने पितरों को जल अर्पित कर रहे हैं।

गुमला के रायडीह में मंझटोली में शंख नदी में भाद्रपद पूर्णिमा के साथ ही पितृपक्ष की शुरुआत हो गई है। पितृपक्ष के दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए नदी, तालाब एवं अन्य जलाशयों में तर्पण कर रहे हैं। झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित बाला नदी में भी प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर विधि-विधान से अपने पितरों को जल अर्पित कर रहे हैं।

रविवार को जनकपुर धाम (नेपाल) से आये  महंत एवं मामा जी बैजू झा शंख मोड़, मांझाटोली निवासी  अमरेश कुमार झा, कमलेश कुमार झा एवं राकेश कुमार झा ने आचार्य सुनील कुमार पाठक के मंत्रोच्चारण के बीच बाला नदी में तर्पण किया। आचार्य सुनील कुमार पाठक ने बताया कि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक पितृपक्ष की अवधि मानी जाती है। इस दौरान पितरों को तर्पण किया जाता है। वहीं, पितरों की मृत्यु तिथि पर विशेष अनुष्ठान करने की परंपरा है। इस अवसर पर ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को दान देने का भी विशेष महत्व है।

उन्होंने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम ने भी पुष्कर में अपने पितरों का तर्पण किया था। पितृपक्ष में तर्पण एवं श्राद्ध कर्म के माध्यम से लोग अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

लोदाम क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाला नदी पहुंचे और विधि-विधान से पितरों को तर्पण किया। आचार्य दिनेश पांडेय ने कहा कि मनुष्य का अस्तित्व अपने पूर्वजों के कारण है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक अपने पितरों को जलांजलि, तिलांजलि एवं पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिए। साथ ही ब्राह्मणों एवं निर्धनों को अन्न, वस्त्र और यथासंभव द्रव्य का दान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुत्ते, कौए और गाय को भोजन कराने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि इन कार्यों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।तर्पण के उपरांत नदी के तट में भोले बाबा को जल अर्पित करके पूजा अर्चना किया गया।और प्रसाद का वितरण भी हुआ।