श्रावणी मेले से हिजला तक: जानिए झारखंड के सबसे बड़े और प्रसिद्ध मेले

  • July 10, 2026 11:47 am
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झारखंड के मेले सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं की कहानी हैं. यहां हर मेला किसी न किसी आस्था, संस्कृति और लोकजीवन से जुड़ा है. यही वजह है कि हर साल लाखों लोग इन मेलों का हिस्सा बनने दूर-दूर से पहुंचते हैं. आइए जानते हैं राज्य के 10 सबसे प्रसिद्ध मेलों के बारे में.

श्रावणी मेले से हिजला तक: जानिए झारखंड के सबसे बड़े और प्रसिद्ध मेले
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श्रावण मास शुरू होते ही झारखंड का देवघर "बोल बम" के जयकारों से गूंज उठता है. लाखों कांवरिया सुल्तानगंज से पवित्र गंगाजल लेकर लगभग 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा तय करते हैं और बाबा बैद्यनाथ मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई पूजा से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. एक महीने तक चलने वाले इस मेले में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं. यह झारखंड का सबसे बड़ा और राजकीय मेला है, जो आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है.

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दुमका में मयूराक्षी नदी के किनारे लगने वाला हिजला मेला झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का अनमोल हिस्सा है. इसकी शुरुआत वर्ष 1890 में हुई थी और आज भी यह पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस मेले में आदिवासी समाज अपने पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, वाद्ययंत्र और हस्तशिल्प का प्रदर्शन करता है. यहां दूर-दूर से कलाकार और पर्यटक पहुंचते हैं. स्थानीय उत्पादों और हस्तनिर्मित वस्तुओं की खरीदारी भी खूब होती है. यह मेला झारखंड की संस्कृति और पर्यटन दोनों को नई पहचान देता है.

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रांची जिले के मांडर प्रखंड स्थित मुड़मा गांव में आयोजित होने वाला मुड़मा जतरा झारखंड के सबसे बड़े पारंपरिक मेलों में गिना जाता है. इस मेले में विभिन्न आदिवासी समुदाय एक साथ मिलकर अपनी संस्कृति का उत्सव मनाते हैं. पारंपरिक वेशभूषा, मांदर की थाप और लोकनृत्य पूरे माहौल को जीवंत बना देते हैं. ग्रामीण खेल, स्थानीय बाजार और सांस्कृतिक कार्यक्रम लोगों को आकर्षित करते हैं. यह मेला नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है.

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हर साल आषाढ़ महीने में रांची के जगन्नाथपुर मंदिर से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की भव्य रथयात्रा निकाली जाती है. हजारों श्रद्धालु रथ को खींचकर पुण्य प्राप्त करने की कामना करते हैं. इस अवसर पर विशाल मेला लगता है, जहां झूले, मिठाइयों की दुकानें, खिलौने और स्थानीय व्यंजन लोगों को आकर्षित करते हैं. धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। यह मेला आस्था और उत्सव का सुंदर संगम प्रस्तुत करता है.

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चतरा जिले में लगने वाला यह मेला धार्मिक और व्यापारिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. फाल्गुन शिवरात्रि और दुर्गा पूजा के अवसर पर हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. मेले में पशुओं की खरीद-बिक्री, कृषि उपकरण, घरेलू सामान और स्थानीय उत्पादों का बड़ा बाजार सजता है. आसपास के गांवों के लोग बड़ी संख्या में इसमें भाग लेते हैं. यह मेला ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ सामाजिक मेलजोल को भी बढ़ावा देता है.

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चतरा जिले के हंटरगंज स्थित कौलेश्वरी देवी मंदिर में लगने वाला कोलहुआ मेला धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है. रामनवमी और बसंत पंचमी के अवसर पर हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं. पहाड़ी पर स्थित मंदिर की प्राकृतिक सुंदरता श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है. मेले में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और स्थानीय बाजार भी लगते हैं. यह मेला श्रद्धा, संस्कृति और पर्यटन का अनोखा संगम है

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कार्तिक पूर्णिमा पर सिमडेगा में लगने वाला कुंदरी मेला ग्रामीण जीवन की सादगी और परंपराओं का सुंदर उदाहरण है. यहां स्थानीय कलाकार पारंपरिक नृत्य और लोकगीत प्रस्तुत करते हैं. किसान, कारीगर और छोटे व्यापारी अपने उत्पादों की बिक्री करते हैं. मेले में हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद और पारंपरिक व्यंजन लोगों को खूब पसंद आते हैं. यह आयोजन ग्रामीण संस्कृति को जीवित रखने के साथ स्थानीय लोगों की आय बढ़ाने में भी मदद करता है.

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बोकारो जिले के लालपनिया स्थित लुगू पहाड़ पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लुगू बुरू घंटाबड़ी मेला आयोजित होता है. इसे संताल आदिवासी समाज का सबसे बड़ा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है. हजारों श्रद्धालु लुगू बुरू की पूजा-अर्चना कर सुख और समृद्धि की कामना करते हैं. इस दौरान पारंपरिक नृत्य, लोकगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं. यह मेला आदिवासी पहचान, एकता और विरासत को संजोकर रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है.

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हजारीबाग में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला नरसिंहस्थान मेला क्षेत्र का एक प्रमुख धार्मिक आयोजन है. श्रद्धालु भगवान नरसिंह के दर्शन कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की प्रार्थना करते हैं. मेले में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं. दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं की वजह से यहां उत्सव जैसा माहौल रहता है. यह मेला धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा दोनों को मजबूत करता है.

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रामगढ़ जिले में मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाला तुतीलावा मेला ग्रामीण संस्कृति और परंपरा का जीवंत उत्सव है. यहां स्थानीय किसान, कारीगर और व्यापारी अपने उत्पादों की बिक्री करते हैं. मेले में लोकनृत्य, लोकगीत, पारंपरिक खेल और स्वादिष्ट स्थानीय व्यंजन लोगों को आकर्षित करते हैं. आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन में शामिल होते हैं. यह मेला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि स्थानीय व्यापार, संस्कृति और सामाजिक मेलजोल को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण आयोजन भी है.