बंदूक छोड़ी, हुनर थामा…रैंप पर दिखाया बदलते बस्तर का नया चेहरा

  • August 16, 2026 4:05 pm
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कभी नक्सली हिंसा के साए में जिंदगी जीने वाली सुकमा की 9 आत्मसमर्पित महिलाएं अब अपने हाथों से नई कहानी बुन रही हैं. हथियार का रास्ता छोड़कर इन महिलाओं ने कोसा सिल्क और हथकरघे को अपनी नई पहचान बनाया है. प्रशिक्षण के बाद वे पारंपरिक बुनाई और हस्तशिल्प से जुड़कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं. इनके हुनर को रायपुर में आयोजित रैंप वॉक के जरिए मंच मिला, जहां इन महिलाओं ने कोसा सिल्क से तैयार परिधानों को पूरे आत्मविश्वास के साथ पेश किया. कभी संघर्ष और हिंसा के लिए पहचाने जाने वाले बस्तर की ये महिलाएं अब हुनर, मेहनत और बदलाव की तस्वीर बनकर सामने आई हैं. कहानी सिर्फ 9 महिलाओं के बदलते जीवन की नहीं, बल्कि उस बस्तर की भी है, जहां नई पीढ़ी के लिए रोजगार, कला और सम्मान के रास्ते खुल रहे हैं.

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सुकमा की 9 महिलाओं ने कभी बंदूक और हिंसा का रास्ता चुना था, लेकिन अब उनकी जिंदगी एक नई दिशा में आगे बढ़ रही है. आत्मसमर्पण के बाद इन महिलाओं ने कोसा सिल्क और हथकरघे का काम अपनाया है. धागों को रंगने, बुनने और कपड़े तैयार करने की कला ने उनके जीवन में बदलाव की नई कहानी लिखी है. अब ये महिलाएं अपने हुनर के जरिए आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रही हैं. उनके लिए यह सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि समाज की मुख्यधारा में लौटने और सम्मान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का माध्यम भी है.

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बस्तर का सुकमा इलाका लंबे समय तक नक्सल हिंसा की वजह से चर्चा में रहा है. इसी क्षेत्र की इन 9 महिलाओं ने हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन की ओर कदम बढ़ाया. आत्मसमर्पण के बाद उन्हें रोजगार और कौशल प्रशिक्षण से जोड़ने की पहल हुई. कोसा सिल्क और हथकरघा उनके लिए नए अवसर लेकर आया. पारंपरिक बुनाई से जुड़कर महिलाएं अपनी मेहनत को हुनर में बदल रही हैं. यह बदलाव बताता है कि सही अवसर और मार्गदर्शन मिलने पर हिंसा के रास्ते से लौटे लोग भी अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं और समाज में सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं.

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कोसा सिल्क बस्तर और छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पहचान से जुड़ा महत्वपूर्ण हस्तशिल्प है. इसकी बुनाई में मेहनत, धैर्य और कौशल की जरूरत होती है। आत्मसमर्पित महिलाओं ने इसी कला को रोजगार का माध्यम बनाया. वे धागों की तैयारी से लेकर कपड़े तैयार करने की प्रक्रिया को सीख रही हैं. हथकरघे की आवाज अब उनके जीवन में संघर्ष की जगह उम्मीद का संदेश दे रही है. कोसा के महीन धागों से तैयार कपड़ों में इन महिलाओं की मेहनत और नई शुरुआत की कहानी दिखाई देती है. उनके लिए हर बुना हुआ कपड़ा आत्मनिर्भरता की ओर एक कदम है.

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हथकरघा सिर्फ कपड़ा बनाने का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम भी है. इन महिलाओं को हथकरघे से जोड़कर उनके लिए सम्मानजनक आजीविका का रास्ता तैयार किया गया. प्रशिक्षण के दौरान वे बुनाई की तकनीक, डिजाइन और कपड़े की गुणवत्ता को समझ रही हैं. धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है. अब वे अपने हाथों से तैयार कपड़ों को देखकर गर्व महसूस करती हैं. जिस जिंदगी में कभी डर और अनिश्चितता थी, उसमें आज काम, हुनर और भविष्य की उम्मीद दिखाई दे रही है। यह बदलाव उनके जीवन की नई शुरुआत है.

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आत्मसमर्पण के बाद सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जिंदगी में वापस लौटना होती है. इन महिलाओं के लिए हुनर प्रशिक्षण इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बना. कोसा सिल्क और हथकरघे से जुड़कर उन्हें अपनी पहचान बनाने का अवसर मिला. अब उनकी पहचान सिर्फ आत्मसमर्पित नक्सली महिलाओं के रूप में नहीं, बल्कि कारीगरों के रूप में भी बन रही है. वे कपड़ों की बुनाई और डिजाइन के जरिए अपनी रचनात्मकता दिखा रही हैं. यह बदलाव बताता है कि रोजगार और कौशल किसी व्यक्ति को नई पहचान देने के साथ उसके आत्मविश्वास को भी मजबूत कर सकते हैं.

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इन महिलाओं की कहानी रायपुर में उस समय खास बन गई, जब उन्होंने तैयार किए गए कोसा सिल्क और हथकरघा परिधानों के साथ रैंप वॉक किया. मंच पर उनका आत्मविश्वास उनके बदलाव की कहानी कह रहा था. यह उनके लिए सिर्फ फैशन शो नहीं था, बल्कि समाज के सामने अपनी नई पहचान पेश करने का अवसर था. बस्तर से निकलकर रायपुर के मंच तक पहुंचना उनके सफर का महत्वपूर्ण पड़ाव रहा. कभी हिंसा के साए में रही इन महिलाओं ने उसी मंच पर हुनर, आत्मविश्वास और सकारात्मक बदलाव का संदेश दिया.

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रायपुर के मंच पर इन महिलाओं की मौजूदगी ने बस्तर की एक अलग तस्वीर सामने रखी. बस्तर को अक्सर नक्सल हिंसा और संघर्ष के संदर्भ में देखा जाता है, लेकिन यहां की कला, संस्कृति और हुनर भी उसकी मजबूत पहचान हैं. कोसा सिल्क से तैयार परिधानों के जरिए महिलाओं ने इसी पहचान को सामने रखा. उनका रैंप वॉक बदलते बस्तर की तस्वीर जैसा नजर आया, जहां हथियारों की जगह हथकरघा और संघर्ष की जगह सृजन दिखाई देता है. यह कहानी बताती है कि बस्तर की पहचान उसकी कला, संस्कृति और मेहनतकश लोगों से भी बनती है.

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रैंप वॉक के दौरान इन महिलाओं के चेहरे पर आत्मविश्वास साफ दिखाई दिया. उनके लिए यह अनुभव इसलिए भी खास था, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में एक बड़ा बदलाव किया है. आत्मसमर्पण के बाद कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़ने ने उन्हें समाज के बीच नए तरीके से खड़े होने का अवसर दिया. मंच पर कदम रखते हुए उन्होंने अपने तैयार किए कपड़ों को प्रस्तुत किया. यह पल उनके लिए सम्मान और खुशी से भरा रहा. उनके आत्मविश्वास ने यह संदेश दिया कि जिंदगी में गलत रास्ते से लौटकर मेहनत और हुनर के जरिए नई शुरुआत संभव है.

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कोसा सिल्क और हथकरघा बस्तर की पारंपरिक कला और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़े हैं. इन महिलाओं के जरिए इस कला को एक नया मानवीय पक्ष भी मिला. उनके हाथों से तैयार कपड़े सिर्फ पारंपरिक शिल्प नहीं, बल्कि बदलाव की कहानी भी बन गए. रायपुर में रैंप वॉक के माध्यम से इन उत्पादों को बड़े मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिला. इससे बस्तर के हस्तशिल्प को पहचान देने के साथ महिलाओं के काम को भी सामने लाने में मदद मिली. स्थानीय कला और रोजगार को साथ जोड़ना क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है.

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सुकमा की इन 9 महिलाओं की कहानी सिर्फ आत्मसमर्पण की कहानी नहीं है. यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें हथियार छोड़कर हुनर को अपनाया गया और संघर्ष की जगह रोजगार को चुना गया. कोसा सिल्क और हथकरघे से जुड़कर महिलाएं अपने भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश कर रही हैं. रायपुर का रैंप उनके सफर का एक यादगार पड़ाव बना, जहां उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ अपनी नई पहचान दिखाई. उनकी कहानी यह संदेश देती है कि अवसर, प्रशिक्षण और सम्मानजनक रोजगार मिलें तो जिंदगी को नई दिशा दी जा सकती है और बस्तर की तस्वीर भी बदली जा सकती है.