कौन हैं भगवान जगन्नाथ की 'मौसी'? जानिए गुंडिचा देवी की पूरी कहानी

  • July 18, 2026 5:43 pm
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हर साल निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक भव्य धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, आस्था और पारिवारिक रिश्तों का अद्भुत प्रतीक भी है. इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं, जिसे भक्त भगवान का 'मायका' मानते हैं. मान्यता है कि यहां भगवान अपनी प्रिय 'मौसी' गुंडिचा देवी से मिलने आते हैं. आखिर गुंडिचा देवी कौन थीं, उन्हें भगवान की 'मौसी' क्यों कहा जाता है और इस परंपरा के पीछे कौन-कौन सी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं? आइए जानते हैं इस अनोखी और सदियों पुरानी कथा के बारे में.

कौन हैं भगवान जगन्नाथ की 'मौसी'? जानिए गुंडिचा देवी की पूरी कहानी
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भगवान जगन्नाथ की वार्षिक रथयात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भावनाओं और पारिवारिक रिश्तों का भी प्रतीक मानी जाती है. इस यात्रा के दौरान भगवान श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर पहुंचते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह यात्रा भगवान के अपनी प्रिय 'मौसी' से मिलने जाने का प्रतीक है. इसलिए गुंडिचा देवी को भगवान जगन्नाथ की स्नेहमयी मौसी कहा जाता है. यह परंपरा सदियों से भक्तों की आस्था और जगन्नाथ संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है.

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सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार गुंडिचा देवी, मालवा के राजा इंद्रद्युम्न की धर्मपत्नी थीं. राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ के भव्य मंदिर के निर्माण और भगवान के विग्रहों की स्थापना का महान कार्य कराया था. इस पूरे धार्मिक अनुष्ठान में रानी गुंडिचा ने भी गहरी श्रद्धा, तप और धैर्य के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनकी निस्वार्थ भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण को देखकर उन्हें जगन्नाथ परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त हुआ. आज भी उनका नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है.

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मान्यता है कि जब भगवान जगन्नाथ प्रकट हुए, तब उन्होंने राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडिचा को वरदान मांगने का अवसर दिया. राजा ने अपने लिए कोई वरदान नहीं मांगा, बल्कि भगवान से भक्तों, सेवकों और अपनी रानी के कल्याण का आशीर्वाद मांगा. रानी गुंडिचा के मातृवत प्रेम, सेवा और वर्षों की प्रतीक्षा से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें मां के समान सम्मान दिया. तभी से उन्हें भगवान की 'मौसी' के रूप में पूजा जाने लगा. यही कारण है कि रथयात्रा के दौरान भगवान हर वर्ष उनके घर जाने की परंपरा निभाते हैं.

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गुंडिचा देवी से जुड़ी केवल एक ही कथा नहीं है. ओडिशा की लोक परंपराओं में एक दूसरी मान्यता भी प्रचलित है, जिसके अनुसार गुंडिचा कोई रानी नहीं, बल्कि एक प्राचीन स्थानीय देवी थीं. लोगों का विश्वास था कि वे गांव और समाज को महामारी, बीमारियों और प्राकृतिक संकटों से बचाती थीं. समय के साथ यह लोकविश्वास भगवान जगन्नाथ की परंपरा से जुड़ गया और उन्हें भगवान की मौसी के रूप में भी सम्मान मिलने लगा. इसी कारण आज भी दोनों मान्यताओं को श्रद्धा के साथ स्वीकार किया जाता है.

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रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा लगभग सात दिनों तक गुंडिचा मंदिर में विराजमान रहते हैं. भक्त इस स्थान को भगवान का 'मायका' भी कहते हैं, क्योंकि यहां उनका स्वागत परिवार के सदस्य की तरह किया जाता है. मान्यता है कि मौसी भगवान और उनके भाई-बहन को प्रेमपूर्वक भोजन कराती हैं और उनके प्रिय व्यंजनों का भोग लगाती हैं. इस दौरान मंदिर का वातावरण किसी पारिवारिक उत्सव जैसा दिखाई देता है, जहां भक्त भी भगवान के इस स्नेहपूर्ण मिलन के साक्षी बनते हैं.

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अक्सर लोग गुंडिचा मंदिर और मौसी मां मंदिर को एक ही मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में दोनों अलग-अलग धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं. गुंडिचा मंदिर वह स्थान है, जहां भगवान रथयात्रा के दौरान सात दिन निवास करते हैं. वहीं बाहुड़ा यात्रा यानी वापसी के समय भगवान मौसी मां मंदिर (अर्धासिनी देवी) भी जाते हैं. यहां उन्हें ओडिशा का प्रसिद्ध पारंपरिक व्यंजन पोड़ा पीठा भोग के रूप में अर्पित किया जाता है. इसलिए जगन्नाथ परंपरा में गुंडिचा मंदिर और मौसी मां मंदिर दोनों का अपना अलग धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है.

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रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ जब गुंडिचा मंदिर में रहते हैं, तब एक विशेष उत्सव हेरा पंचमी मनाया जाता है. मान्यता है कि भगवान बिना माता लक्ष्मी को साथ लिए चले जाते हैं, इसलिए माता लक्ष्मी उनसे मिलने गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं. यह परंपरा पति-पत्नी के स्नेह और मान-मनुहार का प्रतीक मानी जाती है. आज भी इस अनोखी परंपरा को बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाया जाता है.

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गुंडिचा मंदिर भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है. हर वर्ष लाखों श्रद्धालु भगवान के इस दिव्य दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रेम, सेवा, पारिवारिक रिश्तों और भक्ति का अद्भुत संदेश भी देती है. यही कारण है कि रथयात्रा और गुंडिचा मंदिर का महत्व पूरे विश्व में जगन्नाथ भक्तों के लिए विशेष माना जाता है.