कलम से कपड़े तक, सदियों पुरानी कलमकारी की अनोखी कहानी

  • July 28, 2026 10:38 pm
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क्या आपने कभी सोचा है कि एक साधारण कपड़े का टुकड़ा भी सदियों पुरानी कहानी कह सकता है? कलमकारी भारत की ऐसी ही अनोखी कला है, जिसमें प्राकृतिक रंगों, कलम और लकड़ी के ब्लॉकों से कपड़े पर पौराणिक कथाओं, फूल-पत्तियों और खूबसूरत आकृतियों को जीवंत किया जाता है. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से जुड़ी यह कला आज पारंपरिक विरासत से निकलकर साड़ियों, कुर्तियों और होम डेकोर तक पहुंच चुकी है. आइए जानते हैं कलमकारी की शुरुआत, इसकी खास तकनीक और वह कहानी, जो हर डिजाइन के पीछे छिपी है.

कलम से कपड़े तक, सदियों पुरानी कलमकारी की अनोखी कहानी
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क्या आप जानते हैं, कलमकारी सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि भारत की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत है? कपड़े पर प्राकृतिक रंगों से बनाई जाने वाली यह कला अपनी खूबसूरत चित्रकारी, पौराणिक कथाओं और पारंपरिक डिजाइनों के लिए जानी जाती है. आज कलमकारी साड़ियों, कुर्तियों और होम डेकोर तक पहुंच चुकी है

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कलमकारी की परंपरा दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश और तेलंगाना क्षेत्र से जुड़ी है. पुराने समय में चित्रकार और लोक कलाकार गाँव-गाँव घूमकर कपड़ों पर रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाओं के दृश्य बनाते थे. इन चित्रों के साथ वे गीत और कहानियां सुनाकर लोगों तक पौराणिक कथाएं पहुंचाते थे. इस तरह कपड़ा सिर्फ कपड़ा नहीं रहा, बल्कि कहानी कहने का माध्यम बन गया.

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'कलमकारी' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—'कलम' यानी पेन और 'कारी' यानी कलाकारी. पारंपरिक शैली में कलाकार एक खास कलम से कपड़े पर बारीक रेखाएं और चित्र बनाते हैं. इसमें प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. पौधों, फूलों, पत्तियों और दूसरे प्राकृतिक स्रोतों से तैयार रंग कपड़े को अलग पहचान देते हैं.

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समय के साथ कलमकारी की तकनीक में बदलाव आया. हाथ से चित्र बनाने के साथ लकड़ी के ब्लॉकों का इस्तेमाल भी शुरू हुआ. ब्लॉक प्रिंटिंग के जरिए फूल-पत्तियों के बेल-बूटे, मोर, हाथी और अन्य पारंपरिक आकृतियां कपड़े पर उकेरी जाने लगीं. हर रंग को कपड़े पर लगाने के बाद उसे धोया जाता है, जिससे रंगों की परत और डिजाइन साफ दिखाई देते हैं.

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कलमकारी की परंपरा को बेहद प्राचीन माना जाता है और इसके शुरुआती साक्ष्यों को भारतीय उपमहाद्वीप की पुरानी कपड़ा-कला परंपराओं से जोड़ा जाता है. शुरुआत में इसका इस्तेमाल मंदिरों और धार्मिक कथाओं से जुड़े कपड़ों में अधिक होता था. बाद में यह कला धार्मिक सीमाओं से बाहर निकलकर एक व्यापक लोक और सजावटी कला के रूप में विकसित हुई.

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कलमकारी के विकास में गोलकुंडा सल्तनत और मुगल काल का भी प्रभाव दिखाई देता है. इस दौर में पारंपरिक भारतीय चित्रांकन में फारसी शैली के फूल-पत्तियों और सजावटी पैटर्न शामिल हुए. इसी दौरान कलम से की जाने वाली पेंटिंग को 'कलमकारी' नाम से पहचान मिलने की बात कही जाती है. आगे चलकर व्यापारियों के जरिए यह कला भारत से बाहर भी पहुंची.

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आंध्र प्रदेश का मछलीपट्टनम और उसके पास स्थित पेडाना क्षेत्र कलमकारी की ब्लॉक प्रिंटिंग के लिए प्रसिद्ध हैं. यहां लकड़ी के नक्काशीदार ब्लॉकों से कपड़े पर खूबसूरत डिजाइन बनाए जाते हैं. फूल, पत्तियां, मोर और पारंपरिक बेल-बूटे इसकी खास पहचान हैं. आज कलमकारी भारतीय हस्तशिल्प को दुनिया के सामने पहचान दिलाने वाली प्रमुख कलाओं में शामिल है और इससे जुड़े उत्पादों को GI पहचान भी मिली है.

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कभी मंदिरों और पौराणिक कथाओं तक सीमित रहने वाली कलमकारी आज आधुनिक फैशन और होम डेकोर का हिस्सा बन चुकी है. साड़ियां, कुर्तियां, दुपट्टे, बेडशीट, वॉल हैंगिंग और कई सजावटी वस्तुओं में इसके खूबसूरत पैटर्न देखने को मिलते हैं. हर डिजाइन में कारीगरों की मेहनत और भारत की सांस्कृतिक कहानी छिपी है. कलमकारी को अपनाना हमारी पारंपरिक कला और कारीगरों की विरासत को सम्मान देने का एक तरीका भी है.