झारखंड के युवाओं का सवाल: रोजगार का वादा कब बनेगा हकीकत?

  • July 29, 2026 7:06 pm
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झारखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए परीक्षा सिर्फ एक टेस्ट नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की उम्मीद होती है. लेकिन पेपर लीक के आरोप, परीक्षा रद्द होना, भर्तियों का अटकना, जांच और कोर्ट के विवादों ने इस उम्मीद को बार-बार झटका दिया है. वर्षों की मेहनत के बाद जब परीक्षा दोबारा देनी पड़े या भर्ती प्रक्रिया लंबी खिंच जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान अभ्यर्थियों का होता है. आखिर कब सुधरेगी झारखंड की भर्ती व्यवस्था और कब मिलेगा युवाओं को उनकी मेहनत का सही हक?

झारखंड के युवाओं का सवाल: रोजगार का वादा कब बनेगा हकीकत?
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झारखंड में सरकारी नौकरी का सपना देखने वाले युवाओं के सामने सिर्फ प्रतियोगिता की चुनौती नहीं है. परीक्षा की तैयारी के बाद पेपर लीक के आरोप, परीक्षा रद्द होना, जांच, कोर्ट केस और परिणाम में देरी जैसी समस्याएं भी उनका रास्ता रोक रही हैं. कई अभ्यर्थी एक परीक्षा के लिए वर्षों तैयारी करते हैं, लेकिन विवाद के बाद पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू हो जाती है. उम्र निकलने का डर, आर्थिक दबाव और मानसिक तनाव अलग परेशानी है. सवाल यह है कि मेहनत करने वाले युवाओं को बार-बार ऐसी स्थिति का सामना क्यों करना पड़ता है? भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही कब सुनिश्चित होगी?

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3 जुलाई 2022 को झारखंड में जूनियर इंजीनियर की परीक्षा आयोजित की गई थी. परीक्षा के बाद प्रश्नपत्र पहले से उपलब्ध होने के आरोप सामने आए. मामले की जांच शुरू हुई और पुलिस कार्रवाई भी हुई. रंजीत मंडल की गिरफ्तारी समेत कई कदम उठाए गए. विवाद बढ़ने के बाद 25 जुलाई 2022 को JSSC ने पूरी परीक्षा रद्द कर दी. इसका सीधा असर उन हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ा, जिन्होंने महीनों और वर्षों तक तैयारी की थी. परीक्षा रद्द होने का मतलब उनके लिए सिर्फ एक पेपर दोबारा देना नहीं था, बल्कि फिर से तैयारी, खर्च और लंबे इंतजार का सामना करना था.

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JSSC CGL 2023 की परीक्षा भी विवादों से घिर गई. 28 जनवरी 2024 को हुई परीक्षा को लेकर पेपर लीक की आशंका और गड़बड़ी के आरोप उठे. इसके बाद परीक्षा रद्द कर दी गई. 4 फरवरी 2024 को होने वाला अगला चरण भी रद्द हुआ. मामले ने कानूनी रूप लिया और हाईकोर्ट तक पहुंचा. कोर्ट के आदेश के बाद FIR दर्ज करने और जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी. बाद में CID ने भी मामले की जांच की, लेकिन पेपर लीक की पुष्टि नहीं हुई. बावजूद इसके, विवाद और जांच की वजह से अभ्यर्थियों को लंबे समय तक अनिश्चितता का सामना करना पड़ा.

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भर्ती परीक्षाओं के साथ झारखंड की बोर्ड परीक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आई. 2025 में कक्षा 10 की हिंदी और विज्ञान परीक्षा के प्रश्नपत्र WhatsApp पर वायरल होने का मामला सामने आया. इसके बाद झारखंड एकेडमिक काउंसिल यानी JAC ने दोनों परीक्षाओं को रद्द कर दिया. विद्यार्थियों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ी. 7 और 8 मार्च 2025 को इन विषयों की पुनर्परीक्षा कराई गई. मामले की जांच में पुलिस ने कथित मास्टरमाइंड समेत कई आरोपियों को गिरफ्तार किया. इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया कि परीक्षा केंद्रों और प्रश्नपत्रों की सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत है?

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झारखंड की सिपाही और आबकारी सिपाही भर्ती भी लंबे समय तक विवादों में रही. आबकारी सिपाही भर्ती के PET के दौरान कम-से-कम 13 अभ्यर्थियों की मौत ने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए. घटना के बाद शारीरिक दक्षता परीक्षा के नियमों और दौड़ की प्रक्रिया में बदलाव किए गए. दूसरी ओर, जुलाई 2026 में फर्जी पेपर और सॉल्वर गिरोह से जुड़े मामले में 169 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने की बात सामने आई. हालांकि, इस मामले में पेपर लीक साबित नहीं हुआ. ऐसे विवादों ने अभ्यर्थियों के बीच भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ाई.

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झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC की परीक्षाएं भी विवादों से अछूती नहीं रहीं. 14वीं JPSC की प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम और भर्ती प्रक्रिया को लेकर आरोप सामने आए. मामला आगे बढ़ा तो जांच एजेंसियों की भूमिका भी सामने आई. 21 जुलाई 2026 को CID ने JPSC कार्यालय में छापेमारी की. डिजिटल रिकॉर्ड और जरूरी दस्तावेज जांच के दायरे में लिए गए. इसके बाद मेंस परीक्षा समेत कई परीक्षाओं को स्थगित करना पड़ा। जब किसी परीक्षा की तैयारी में युवाओं के कई साल लग जाते हैं, तब परीक्षा स्थगित होने का असर सिर्फ कैलेंडर पर नहीं, बल्कि उनके करियर और उम्र पर भी पड़ता है.

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झारखंड में भर्ती प्रक्रिया पर सिर्फ पेपर लीक और परीक्षा विवाद का असर नहीं पड़ा. कई भर्तियां कोर्ट के फैसलों, नियमों और कानूनी विवादों में भी फंसी रहीं. हाईकोर्ट के फैसले के बाद JSSC के 12 विज्ञापन वापस लेने पड़े। 4,919 पदों वाली JSSC सिपाही भर्ती भी रद्द हो गई. सहायक आचार्य, JTET और दूसरी कई भर्तियों की प्रक्रिया लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी. इसका सबसे बड़ा नुकसान उन अभ्यर्थियों को हुआ, जिन्होंने नौकरी की उम्मीद में लगातार तैयारी की. कई युवाओं के लिए भर्ती में देरी का मतलब उम्र सीमा पार होने का खतरा भी है.

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झारखंड में रोजगार हमेशा चुनावी राजनीति का बड़ा मुद्दा रहा है. 2019 में दो साल के भीतर 5 लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा किया गया था. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार लगभग 34 हजार सरकारी नियुक्तियां ही हो सकीं, यानी घोषित लक्ष्य का करीब 6.8 प्रतिशत. इसके बाद 2024 में रोजगार को लेकर 10 लाख का नया लक्ष्य सामने आया। लेकिन युवाओं के बीच सवाल अब भी वही है—घोषणाओं और जमीन पर होने वाली नियुक्तियों के बीच इतनी बड़ी दूरी क्यों है? युवा सिर्फ नौकरी के वादे नहीं, बल्कि नियमित परीक्षा कैलेंडर, समय पर नियुक्ति और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया चाहता है.

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पेपर लीक का आरोप हो, परीक्षा रद्द हो, भर्ती कोर्ट में अटके या परिणाम आने में वर्षों लगें—हर स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान अभ्यर्थियों को उठाना पड़ता है. एक परीक्षा के लिए युवा महीनों नहीं, कई बार वर्षों तक तैयारी करते हैं। परीक्षा रद्द होने पर उन्हें फिर से किताबें खोलनी पड़ती हैं. दोबारा फॉर्म, यात्रा, फीस और तैयारी का खर्च बढ़ता है. सबसे बड़ी चिंता उम्र सीमा की होती है. सरकारें और भर्ती आयोग बदल सकते हैं, लेकिन अभ्यर्थियों के बीते हुए साल वापस नहीं आते. झारखंड का युवा अब सिर्फ आश्वासन नहीं चाहता. उसकी मांग है—पारदर्शी परीक्षा, तय समय पर भर्ती, तेज जांच और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही.