बर्तन धोने से पद्मश्री तक: दुलारी देवी के संघर्ष की मिसाल

  • July 24, 2026 2:36 pm
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12 साल की उम्र में शादी, आर्थिक तंगी, बर्तन धोकर जीवनयापन और अपनों को खोने का गहरा दर्द— दुलारी देवी की जिंदगी संघर्षों से भरी रही. लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. उन्होंने अपनी मुश्किलों को ही अपनी ताकत बनाया और मधुबनी पेंटिंग के जरिए नई पहचान हासिल की. अपनी कला, मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने बिहार की इस पारंपरिक लोककला को देश ही नहीं, दुनिया भर में पहचान दिलाई. साल 2021 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया. आज दुलारी देवी हजारों युवाओं और कलाकारों के लिए प्रेरणा हैं. उनकी कहानी सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसला मजबूत हो और मेहनत पर विश्वास हो, तो हर सपना सच हो सकता है.

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बिहार के मिथिला क्षेत्र में जन्मी दुलारी देवी का बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता. महज 12 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई. कम उम्र में ही उन्हें घरेलू जिम्मेदारियों का बोझ उठाना पड़ा. आर्थिक तंगी और सामाजिक चुनौतियों के बीच उनका बचपन संघर्षों में गुजर गया, लेकिन उन्होंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी.

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शादी के बाद हालात ऐसे बने कि दुलारी देवी को मायके लौटना पड़ा. परिवार की मदद के लिए उन्होंने घरों में बर्तन धोने और छोटे-मोटे काम किए. गरीबी और कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने मेहनत करना नहीं छोड़ा. यही संघर्ष आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना.

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इसी दौरान उनकी मुलाकात मिथिला की प्रसिद्ध लोककला मधुबनी पेंटिंग से हुई. उन्होंने मिट्टी की कच्ची दीवारों और जमीन पर चित्र बनाकर इस कला को सीखना शुरू किया. धीरे-धीरे उनकी मेहनत, कल्पनाशक्ति और पारंपरिक शैली ने उन्हें एक अलग पहचान दिलानी शुरू कर दी.

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दुलारी देवी की मधुबनी पेंटिंग अपनी सादगी, पारंपरिक रंगों और प्रकृति से जुड़े विषयों के लिए प्रसिद्ध हुई. उनकी बनाई पेंटिंग्स देश के कई कला मंचों पर प्रदर्शित हुईं और विदेशों तक पहुंचीं. उन्होंने अपनी कला के माध्यम से बिहार की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाई.

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साल 2021 में भारत सरकार ने मधुबनी कला में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. यह सम्मान उनके दशकों के संघर्ष, मेहनत और समर्पण का परिणाम था. दुलारी देवी ने कहा कि उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि उनकी कला उन्हें देश के इतने बड़े सम्मान तक पहुंचाएगी.

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आज दुलारी देवी सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक गुरु भी हैं. वे बच्चों और युवा कलाकारों को मधुबनी पेंटिंग सिखाती हैं. साथ ही उन्हें भारतीय संस्कृति, लोक परंपराओं, त्योहारों और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश भी देती हैं.

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दुलारी देवी मानती हैं कि मधुबनी पेंटिंग के असली रंग प्रकृति से मिलते हैं. इसलिए वे पेड़-पौधों और पर्यावरण की रक्षा को कला से जोड़ती हैं. उनका कहना है, "अगर प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी हमारी कला, संस्कृति और परंपराएं भी जीवित रहेंगी."

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दुलारी देवी ने जिंदगी में गरीबी, अपनों को खोने का दर्द और कई कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन कभी हार नहीं मानी. उनकी एक बात आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करती है— "रोएंगे तो काम कैसे करेंगे?" यही सोच उन्हें संघर्षों से निकालकर पद्मश्री सम्मान तक ले गई और आज वे मेहनत, आत्मविश्वास और हौसले की मिसाल बन चुकी हैं.