बिहार के हर घर की कभी पहचान थे ये 10 देसी सामान, क्या आपको हैं याद?

  • July 15, 2026 12:08 pm
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एक समय था जब बिहार के हर घर में सिल-बट्टे की आवाज़ गूंजती थी, मिट्टी के घड़े का ठंडा पानी मेहमानों का स्वागत करता था, लालटेन की रोशनी से घर जगमगाता था और चारपाई पर पूरा परिवार एक साथ बैठकर सुख-दुख बांटता था। उस दौर में ये देसी सामान सिर्फ रोजमर्रा के उपयोग की चीजें नहीं थे, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा, आत्मनिर्भरता और सादगी भरे जीवन की पहचान थे. समय के साथ आधुनिक उपकरणों ने इनकी जगह जरूर ले ली, लेकिन इनसे जुड़ी यादें आज भी हर बिहारी के दिल में उतनी ही ताजा हैं. आइए जानते हैं बिहार के उन 10 पारंपरिक सामानों के बारे में, जो कभी हर घर की शान और पहचान हुआ करते थे.

बिहार के हर घर की कभी पहचान थे ये 10 देसी सामान, क्या आपको हैं याद?
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सिल-बट्टा बिहार के पारंपरिक रसोईघरों की सबसे खास पहचान हुआ करता था. इसका उपयोग लहसुन, अदरक, हरी मिर्च, धनिया, जीरा, हल्दी और अन्य मसालों को हाथ से पीसने के लिए किया जाता था. सिल-बट्टे पर धीरे-धीरे पीसे गए मसालों का स्वाद और खुशबू मिक्सर में पीसे गए मसालों की तुलना में कहीं अधिक प्राकृतिक और गहरा माना जाता है, क्योंकि इसमें मसालों के प्राकृतिक तेल और सुगंध बरकरार रहते हैं. आज भी कई गांवों और पारंपरिक घरों में स्वाद और परंपरा को जीवित रखने के लिए सिल-बट्टे का उपयोग किया जाता है.

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ओखली-मूसल लकड़ी या पत्थर से बना एक पारंपरिक घरेलू उपकरण है, जिसका उपयोग धान कूटने, दाल छीलने, मसाले, लहसुन, मिर्च और अन्य अनाज को कूटने के लिए किया जाता था. पहले लगभग हर ग्रामीण घर में यह आसानी से देखने को मिल जाता था और महिलाएं रोजमर्रा के कई काम इसी की मदद से करती थीं. यह केवल एक रसोई उपकरण नहीं था, बल्कि ग्रामीण जीवन की मेहनत, आत्मनिर्भरता और पारिवारिक सहयोग का प्रतीक भी माना जाता था.

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जाँता, जिसे हाथ चक्की भी कहा जाता है, दो गोल पत्थरों से बनी होती है जिन्हें हाथ से घुमाकर गेहूं, मक्का, चना, जौ और अन्य अनाज का ताजा आटा तैयार किया जाता था. इससे निकला आटा पौष्टिक, ताजा और स्वादिष्ट माना जाता था क्योंकि इसमें किसी मशीन या बिजली का उपयोग नहीं होता था. पहले हर घर में सुबह-सुबह चक्की चलने की आवाज सुनाई देती थी, जो गांवों की दिनचर्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करती थी.

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चारपाई लकड़ी और मजबूत रस्सियों से बनाई जाती थी और इसका उपयोग सोने, बैठने, आराम करने तथा मेहमानों के स्वागत के लिए किया जाता था. गर्मियों के मौसम में लोग खुले आंगन या छत पर चारपाई बिछाकर सोते थे, जिससे ठंडी हवा का आनंद मिलता था. यह टिकाऊ, आरामदायक और आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने योग्य होती थी। गांवों में चौपाल और पारिवारिक बैठकों की सबसे पसंदीदा जगह भी यही चारपाई होती थी.

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मिट्टी का घड़ा लगभग हर घर में पीने का पानी ठंडा रखने के लिए रखा जाता था। इसकी खासियत यह थी कि बिना बिजली और फ्रिज के भी यह पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा और ताजा बनाए रखता था. मिट्टी के घड़े का पानी स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक माना जाता है. आज भी कई लोग गर्मियों में घड़े का पानी पीना पसंद करते हैं क्योंकि यह शरीर को प्राकृतिक ठंडक देता है

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बांस, खजूर या ताड़ के पत्तों से बना हाथ का पंखा, जिसे कई जगहों पर 'वेना' कहा जाता है, गर्मियों में ठंडी हवा पाने का सबसे आसान और सस्ता साधन था. बिजली न होने पर पूरा परिवार इसी पंखे की मदद से गर्मी से राहत पाता था. शादी-ब्याह, पूजा-पाठ और गांव की बैठकों में भी इसका खूब उपयोग होता था. यह पूरी तरह प्राकृतिक, पर्यावरण के अनुकूल और ग्रामीण जीवन की सादगी का प्रतीक था.

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बांस से बना सूप खेती-किसानी करने वाले परिवारों के लिए बेहद जरूरी घरेलू सामान था. इसका उपयोग धान, गेहूं और चावल से भूसी, धूल और छोटे कंकड़ अलग करने के लिए किया जाता था. इसके बिना अनाज साफ करने का काम अधूरा माना जाता था. धार्मिक दृष्टि से भी सूप का विशेष महत्व है, क्योंकि छठ पूजा सहित कई पारंपरिक त्योहारों में इसी में पूजा की सामग्री और प्रसाद सजाया जाता है.

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हँसुआ बिहार के किसानों का सबसे पुराना और भरोसेमंद कृषि औजार माना जाता है. इसकी अर्धचंद्राकार तेज धार की मदद से धान, गेहूं और अन्य फसलों की कटाई, घास व चारा काटने, खरपतवार साफ करने तथा खेती से जुड़े कई छोटे-बड़े काम आसानी से किए जाते थे। पहले लगभग हर ग्रामीण घर और किसान के पास हँसुआ जरूर होता था, क्योंकि इसके बिना खेती के कई जरूरी काम पूरे करना मुश्किल माना जाता था. आधुनिक कृषि मशीनों के आने के बाद इसका उपयोग भले ही कम हो गया हो, लेकिन आज भी छोटे खेतों और ग्रामीण इलाकों में हँसुआ उतना ही उपयोगी और भरोसेमंद माना जाता है. यह केवल एक कृषि औजार नहीं, बल्कि बिहार की खेती, मेहनत, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण संस्कृति का जीवंत प्रतीक भी है

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बिजली आने से पहले लालटेन ही गांवों और घरों में रोशनी का सबसे बड़ा सहारा हुआ करती थी. मिट्टी के तेल से चलने वाली इस लालटेन की रोशनी में बच्चे पढ़ाई करते थे, महिलाएं खाना बनाती थीं और पूरा परिवार रात में एक साथ बैठकर बातें करता था. खेतों, दुकानों और यात्रा के दौरान भी लालटेन का खूब उपयोग किया जाता था. आज यह एक पुरानी याद जरूर बन गई है, लेकिन ग्रामीण जीवन की सबसे खूबसूरत पहचान में से एक मानी जाती है.

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मिट्टी, बांस, लकड़ी या धातु से बनी अनाज रखने की कोठी किसान परिवारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती थी. इसमें गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा, दाल और अन्य अनाज को महीनों तक सुरक्षित रखा जाता था ताकि नमी, कीड़े और चूहों से बचाव हो सके. अच्छी फसल के बाद सबसे पहले अनाज इसी कोठी में भरा जाता था, इसलिए इसे घर की समृद्धि, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक माना जाता था. पहले लगभग हर ग्रामीण घर में ऐसी कोठी जरूर देखने को मिलती थी