15 दिन दर्शन क्यों नहीं देते भगवान जगन्नाथ..क्या है भगवान जगन्नाथ का अनासार काल !

  • June 30, 2026 5:22 pm
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भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से पहले एक ऐसी अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जिसके तहत भगवान 15 दिनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते. आखिर इस एकांतवास (अनासार काल) का क्या महत्व है और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है? आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी.

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रथ यात्रा से पहले स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को 108 कलशों के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है. यह अनुष्ठान जगन्नाथ मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है. मान्यता है कि इस दिन देवताओं का सार्वजनिक अभिषेक किया जाता है, जिसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं.

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धार्मिक मान्यता के अनुसार, 108 कलशों के ठंडे जल से स्नान करने के बाद भगवान जगन्नाथ अस्वस्थ हो जाते हैं और उन्हें ज्वर हो जाता है. यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि भगवान अपने भक्तों की तरह मानवीय भावनाओं और अवस्थाओं का अनुभव करते हैं. इसी कारण उन्हें आराम की आवश्यकता होती है.

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भगवान के अस्वस्थ होने के बाद उन्हें लगभग 15 दिनों के लिए एकांत कक्ष में रखा जाता है. इस अवधि को अनासार काल कहा जाता है. इस दौरान श्रीमंदिर के गर्भगृह के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और भगवान के दर्शन नहीं होते. यह समय भगवान के विश्राम और स्वास्थ्य लाभ का माना जाता है.

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अनासार काल के दौरान केवल मंदिर के सेवायत ही भगवान की सेवा करते हैं. उन्हें औषधीय जड़ी-बूटियों से बने पेय, फल, काढ़ा और हल्का भोग अर्पित किया जाता है. मान्यता है कि आयुर्वेदिक विधि से भगवान का उपचार किया जाता है और उनकी प्रतिदिन विशेष पूजा-अर्चना होती है.

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15 दिनों के विश्राम के बाद भगवान पूरी तरह स्वस्थ होकर नए और दिव्य स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं. इसे नवयौवन दर्शन कहा जाता है. इस दिन भगवान का विशेष श्रृंगार किया जाता है और लाखों श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

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नवयौवन दर्शन के अगले दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की यात्रा पर निकलते हैं. यही विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा है, जिसमें लाखों श्रद्धालु रथ खींचकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. यह यात्रा आस्था, भक्ति और सनातन परंपरा का अद्भुत प्रतीक मानी जाती है.