क्या वर्क प्रेशर से महिलाओं में बढ़ रहा है मानसिक तनाव, डिप्रेशन और एंग्जायटी के इन लक्षणों को न करे नजरंदाज

अक्सर महिलाएं अपनी सेहत को दूसरी प्राथमिकता और परिवार की जरूरतों को पहली प्राथमिकता देती हैं. बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के काम और परिवार के दूसरे सदस्यों की देखभाल तक, वे हर जिम्मेदारी निभाने में जुटी रहती हैं. ऐसे में अपनी थकान, बेचैनी और मानसिक परेशानियों को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देती हैं.

क्या वर्क प्रेशर से महिलाओं में बढ़ रहा है मानसिक तनाव, डिप्रेशन और एंग्जायटी के इन लक्षणों को न करे नजरंदाज

टीनपी डेस्क (TNP DESK): आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में लोग ऐसे बिजी हो जाते है जैसे उन्हें अपनी फिक्र हो ही न. ऐसे में आज की महिला जीत जागता उधारण है.  आज की महिलाएं घर और ऑफिस, दोनों की जिम्मेदारियां बखूबी निभाने की कोशिश करती हैं. ऐसे में ऑफिस में काम का दबाव, डेड्लाइन पूरा करने का प्रेशर, और उससे भी बड़ी बात, घर लौटने के बाद परिवार की देखभाल. इन सबके बीच कई बार महिलाएं खुद के लिए समय निकालना ही भूल जाती हैं. धीरे-धीरे यही बिजी लाइफस्टाइल से मानसिक तनाव, एंग्जायटी और डिप्रेशन की वजह बन सकती है. परेशानी तब बढ़ जाती है, जब महिलाओं को घर और कार्यस्थल, दोनों जगह पर्याप्त सहयोग नहीं मिल पाता.

अक्सर महिलाएं अपनी सेहत को दूसरी प्राथमिकता और परिवार की जरूरतों को पहली प्राथमिकता देती हैं. बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के काम और परिवार के दूसरे सदस्यों की देखभाल तक, वे हर जिम्मेदारी निभाने में जुटी रहती हैं. ऐसे में अपनी थकान, बेचैनी और मानसिक परेशानियों को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देती हैं. लेकिन लगातार तनाव में रहना न केवल मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि शारीरिक सेहत और रिश्तों पर भी असर डाल सकता है. इसलिए जरूरी है कि महिलाएं दूसरों की देखभाल के साथ खुद की जरूरतों को भी समझें और अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें.

महिलाओं में मानसिक तनाव बढ़ने के प्रमुख कारण

कामकाजी महिलाओं पर घर और ऑफिस की दोहरी जिम्मेदारी का दबाव रहता है. ऑफिस में अधिक काम, समय की कमी, नौकरी की असुरक्षा और सहकर्मियों या अधिकारियों का सहयोग न मिलना तनाव बढ़ा सकता है. वहीं, घर की जिम्मेदारियों में बराबर सहयोग नहीं मिलने से महिलाओं को आराम और खुद के लिए समय निकालने का मौका कम मिलता है. इसके अलावा, काम खत्म होने के बाद भी ऑफिस से जुड़े विचारों में उलझे रहना, काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन न बना पाना और लगातार बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव मानसिक थकान बढ़ा सकता है.

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

मानसिक तनाव का असर शरीर और व्यवहार, दोनों पर दिखाई दे सकता है. बार-बार सिरदर्द, गर्दन या पीठ में दर्द, लगातार थकान, नींद न आना या जरूरत से ज्यादा सोना इसके संकेत हो सकते हैं. कुछ महिलाओं को भूख में बदलाव और पाचन संबंधी परेशानियां भी हो सकती हैं.

वहीं, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, चिड़चिड़ापन, बेचैनी, बिना किसी स्पष्ट कारण के रोने का मन करना, अपनों से दूरी बनाना और काम में रुचि खत्म होना भी ध्यान देने योग्य संकेत हैं. यदि ये लक्षण लगातार बने रहें और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें, तो इन्हें केवल थकान समझकर टालना ठीक नहीं है.

अपनी सेहत को दें प्राथमिकता

मानसिक तनाव से बचने के लिए महिलाओं को सबसे पहले यह समझना होगा कि परिवार की देखभाल करने के लिए खुद का स्वस्थ रहना भी जरूरी है. घर के कामों और बच्चों की जिम्मेदारियों को परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बांटना चाहिए. जरूरत पड़ने पर ऑफिस में भी अपनी परेशानी साझा करें और काम की सीमाएं तय करें. रोजाना थोड़ी देर टहलना, योग करना, गहरी सांस लेने का अभ्यास और पर्याप्त नींद लेना मददगार हो सकता है. इसके साथ ही अपने पसंदीदा कामों के लिए समय निकालें और अपनी भावनाओं को मन में दबाकर रखने के बजाय किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें.

अगर तनाव, घबराहट या उदासी लंबे समय तक बनी रहे, नींद प्रभावित हो या रोजमर्रा के काम करना मुश्किल होने लगे, तो मनोवैज्ञानिक या डॉक्टर की सलाह लें. याद रखें, खुद को प्राथमिकता देना स्वार्थ नहीं है. अपनी मानसिक और शारीरिक सेहत का ध्यान रखकर ही महिलाएं बेहतर तरीके से अपनी और अपने परिवार की देखभाल कर सकती हैं.