नवरात्रि में एक माँ की पूजा, तो एक का तिरस्कार क्यों? पढ़ें दर-दर भटकने को मजबूर लाचार माँ  की कहानी

    नवरात्रि में एक माँ की पूजा, तो एक का तिरस्कार क्यों? पढ़ें दर-दर भटकने को मजबूर लाचार माँ  की कहानी

    दुमका(DUMKA):कलश स्थापना के साथ ही शारदीय नवरात्र की शुरुआत हो गयी. गांव से लेकर शहर तक या देवी सर्वभूतेषु का मंत्रोचार हो रहा. एक तरफ तो हम लोग माता रानी के आगमन का ढोल नगाड़े से स्वागत कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ एक माँ अपने ही घर का ताला खोलवाकर रहने के लिए एसडीओ कार्यालय का चक्कर लगा रही है. इस माँ को बेघर करने वाला कोई और नहीं बल्कि अपने ही संतान है.

    नवरात्रि में एक माँ की पूजा,  तो एक का तिरस्कार क्यों?

    दुर्गा सप्तसती में लिखा गया है पुत्र कुपुत्र हो सकता है, माता कुमाता नहीं. एसडीओ के पास फरियाद लेकर पहुंची इस बूढ़ी मां का नाम है सुखिया देवी. नाम भले ही सुखिया हो लेकिन इसके जीवन मे सुख नसीब कहाँ. 2 वर्ष पूर्व पति का साथ छूट गया. पति के रहते जीवन की गाड़ी किसी तरह चल रही थी क्योंकि 3 बेटों की परवरिश में अपनी जीवन बिता दी. पाई पाई जोड़ कर बेटों को उसके पैरों पर खड़ा किया, लेकिन आज तीन बेटे मिलकर भी एक मां की परवरिश नहीं कर पा रहे हैं. 

    पढ़ें दर-दर भटकने को मजबूर लाचार माँ  की कहानी

    कहने के लिए तो तीन बेटे हैं. राजेन्द्र दिल्ली में प्राइवेट जॉब करता है, महेंद्र दुमका में व्यवसाय से जुड़ा है और छोटा लड़का उदय धनबाद के निरसा में शिक्षक है. मूल रूप से जामा थाना के माठाचक गांव के रहने वाली है, लेकिन शहर में आलीशान मकान है. चलने फिरने में लाचार मां शहर के मकान में रहना चाहती है. लेकिन पुत्र द्वारा मकान में ताला बंद कर रखा गया है. अकेली मां को मुख्य सड़क से 3 किलोमीटर दूर माठाचक गांव में रखा गया है.

    दुखिया की कहानी चर्चित हिंदी मूवी बागवान से मिलती जुलती है

    बात यहीं समाप्त नहीं होती. दुखिया की कहानी चर्चित हिंदी मूवी बागवान से मिलती जुलती है.पति के जीवित रहते भी पुत्रों द्वारा तिरष्कृत होती रही. पति के मरने के बाद एक वर्ष तक खाना बना कर खाती रही. जब खाना बनाने में असमर्थ हो गयी तो पुत्रों ने मां का बंटवारा कर लिया गया. एक माँ ने तीन पुत्रों की तब तक परवरिश की जब तक तीनों पुत्र अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो गया, लेकिन आज वही मां दो जून की रोटी के लिए तरस रही है. सभी  पुत्र एक एक महीने तक खाना की व्यवस्था की जाती है. एक माँ के लिए बेटा बहु के हाथ का बना खाना खाने का सपना साकार नहीं हो पाया. होटल से सुबह शाम माँ के लिए खाना आने लगा. दुखिया की माने तो बेटा कौन कहे, अब तो पोता भी आंखें दिखता है और खाना बंद करने की धमकी देता है.

    बूढ़ी मां की व्यथा को एसडीओ कौशल कुमार ने गंभीरता से सुना

    एक बूढ़ी मां की व्यथा को एसडीओ कौशल कुमार ने गंभीरता से सुना और हर संभव सहयोग का भरोसा दिया. इस बाबत एसडीओ ने कहा कि मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत तीनों बेटों को नोटिस किया जाएगा और आगे की कार्यवाई की जाएगा.दुखिया के जीवन मे सुख नसीब होगा या दुख में ही जीवन व्यतीत हो जाएगा यह तो अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना जरूर है कि दुखिया देवी एकलौती मां नहीं जो दुख काट रही हो. दुखिया तो एक उदाहरण मात्र है ना जाने ऐसी कितनी मां होगी तभी तो हर शहर में वृद्धाश्रम देखने को मिल जाता है. आखिर कहां जा रहा है हमारा समाज. भाग दौड़ भरी इस जीवन में रिश्ते नाते सभी इतिहास के पन्नो पर दर्ज होने लगा है.

    रिपोर्ट- पंचम झा


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