क्यों चूं -चूं का मुरब्बा बनने जा रहा धनबाद के मेयर का "म्यूजिकल चेयर", राजनीति में नए एंट्री वाले क्यों है आकर्षित!

    क्यों चूं -चूं का मुरब्बा बनने जा रहा धनबाद के मेयर का "म्यूजिकल चेयर", राजनीति में नए एंट्री वाले क्यों है आकर्षित!

    धनबाद(DHANBAD): धनबाद में मेयर का पद "म्यूजिकल चेयर" बनने जा रहा है.  अभी तक यह सार्वजनिक नहीं हुआ है कि मेयर का पद सामान्य रहेगा या आरक्षित, लेकिन चुनाव लड़ने वालों की लंबी लाइन लग गई है.  कारोबारी हो अथवा राजनीतिक दल के नेता, सभी किस्मत आजमाने को आतुर है.  रोज नए-नए उम्मीदवार सामने आ रहे है.  शहर के कई जगहों पर होर्डिंग भी लग गई है.  सबसे अधिक दावेदारी भाजपा में है, तो महागठबंधन के नेता भी कम नहीं है.  कारोबारी भी आगे -आगे चल रहे है.  बता दें कि झारखंड में निकाय चुनाव लंबित है और अगले साल मार्च के पहले चुनाव करना झारखंड सरकार के लिए भी जरूरी है.  नहीं तो सरकार को भारी नुकसान हो सकता है.  भाजपा में तो उम्मीदवारी को लेकर दावेदारी बढ़  रही है, तो इधर महागठबंधन में भी कमोबेश वही स्थिति है.  कांग्रेस  से भी उम्मीदवार हैं, तो झामुमो  के भी लोग उम्मीदवारी ठोक रहे है. 

    दलीय आधार पर नहीं होता है निकाय चुनाव ,फिर भी समर्थन मिलता है 
     
    यह  अलग बात है कि निगम का चुनाव दलीय आधार पर नहीं होता है.  फिर भी किसी न किसी दल का उम्मीदवारों को समर्थन तो मिलता ही रहा है.  ऐसे में मेयर पद के कितने उम्मीदवार खड़े होंगे, यह कहना फिलहाल कठिन है.  2015 के चुनाव में शेखर अग्रवाल ने कांग्रेस नेता शमशेर आलम को पराजित कर चुनाव जीता था.  उस समय भी उम्मीदवारों की संख्या लगभग दो दर्जन थी.  उस समय यह सीट  ओबीसी के लिए आरक्षित थी.  2026 में उम्मीद की जा रही है कि यह  सीट  सामान्य वर्ग के लिए होगी.  इस वजह से भी उम्मीदवारों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है और आगे बढ़ने  की संभावना है. मेयर का चुनाव लड़ने के बहाने कई लोगों की राजनीति में नई एंट्री भी होने जा रही है.  धनबाद राजनीतिक रूप से शुरू से ही "सेंसिटिव" रहा है. यहां के लोगों की अपनी राजनीतिक समझ भी है. वह अपने ढंग से देश और प्रदेश की राजनीति को समझते है. फिलहाल धनबाद में नगर निगम चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी हुई है. उम्मीदवारों की लंबी फौज है, लेकिन एक नियम भी है और हो सकता है कि इस नियम से कई लोग चुनाव से डिबार भी हो जाए. 

    बच्चों का शर्त भी उम्मीदवारी पर लागू होगी ,जानिए क्या है यह नियम 

    सूत्र बताते हैं कि जिनके तीन बच्चे हैं, वह चुनाव नहीं लड़ सकता है. लेकिन शर्त  है कि 2013 के बाद तीसरे बच्चे का जन्म हुआ हो.  अब यह आंकड़ा फिलहाल निकालना तो मुश्किल है कि जो लोग चुनाव लड़ने का दावा कर रहे हैं, उन्हें 2013 के बाद क्या कोई बच्चा पैदा हुआ है अथवा नहीं. लेकिन अगर हुआ है तो चुनाव से वह डिबार हो सकते है. 2013 के पहले जिन्हें तीन बच्चे हैं, उन पर कोई पाबंदी नहीं रहेगी. बताया तो यह भी जाता है कि पार्षद के चुनाव में भी अगर कोई निगम की तीन बैठकों में शामिल नहीं हुआ हो, तो उसे भी चुनाव से अलग कर दिया जा सकता है.  हालांकि तीन बैठक में शामिल नहीं होने की उन्हें कोई प्रमाणिक वजह बतानी होगी. धनबाद में फिलहाल "गाछे  कठहर,ओठे तेल" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है.  चुनाव आयोग अभी तक झारखंड में निकाय चुनाव की तिथि की घोषणा नहीं की है.  अधिकृत रूप से यह भी घोषित नहीं हुआ है कि धनबाद का मेयर पद सामान्य होगा या आरक्षित होगा.  बावजूद प्रत्याशियों की सक्रियता तेज हो गई है.    

    जानिए कब हुआ था धनबाद नगर निगम का गठन ,फिर कब हुआ पहला चुनाव 
     
    धनबाद में 2006 में नगर निगम का गठन हुआ था. 2010 में पहली बार निगम का चुनाव हुआ ,जिसमें इंदु देवी मेयर चुनी गई. उस समय यह  सीट महिलाओं के लिए आरक्षित था. उसके बाद 2015 में चुनाव हुआ, जिस समय शेखर अग्रवाल मेयर चुने गए.  उस समय यह सीट ओबीसी के लिए आरक्षित था. उस वक्त कुल 23 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे.आइये बताते है किसको कितने मत मिले थे ---- 1- अवधेश कुमार -24598,2 -उत्पल कुमार मोदी -9712,3 -कुणाल सिंह- 8185,4 -गणपत महतो -11501,5 -गणेश कुमार गुप्ता -10849,6 -चन्द्र शेखर अग्रवाल -93136,7 -दिनेश कुमार महतो- 25939,8 -दीना नाथ ठाकुर -8676,9 - प्रदीप कुमार संथालिया- 6258,10- प्रहलाद साव -6391,11- भृगु नाथ भगत 9367,12 -मणिलाल महतो -5875,13- मेघनाथ रवानी -6313,14- रजनीश कुमार- 6432,15- रवीन्द्र कुमार वर्मा -6666,16 -राज कुमार अग्रवाल -29081,17- रामचंद्र रवानी -4633,18 -शमसेर आलम अंसारी- 50611,19 -सदानन्द महतो- 35593,20 -सन्तोष कुमार महतो- 15367,21- संतोष कुमार साव -4501,22 -सुरेश प्रसाद यादव- 5351,23 -सुशील कुमार सिंह -13293,24 -नोटा -7755

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 


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