भाजपा में यह कैसा तूफ़ान-विधायक राज सिन्हा ने सुंदरकांड के प्रसंग से किसको-किसको निशाने पर लिया!

    भाजपा में यह कैसा तूफ़ान-विधायक राज सिन्हा ने सुंदरकांड के प्रसंग से किसको-किसको निशाने पर लिया!

    धनबाद(DHANBAD): निकाय चुनाव को लेकर धनबाद भाजपा में तूफान मचा हुआ है.  पार्टी  का अनुशासन तार -तार  हो गया है.  भाजपा के समर्थित उम्मीदवार की घोषणा के बावजूद कई लोगों ने नामांकन कर दिया है. अब निशाना साधने का सिलसिला शुरू हो गया है. कार्यकर्ताओं के भी कई सवाल हैं.  भाजपा के काद्यावर नेता रहे पूर्व मेयर  शेखर अग्रवाल ने पार्टी ही छोड़ दी  और झामुमो के साथ हो गए.  इधर, झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह ने भी मेयर पद के लिए नामांकन कर दिया है.  भाजपा के और लोगों ने नामांकन किया है.  मुकेश पांडे ने भी नामांकन किया है तो शांतनु चौधरी ने भी पार्टी का मोह  छोड़कर मैदान में कूद गए हैं.  

    विधायक राज सिन्हा  और शेखर अग्रवाल के बीच 36 के आंकड़े जग  जाहिर है और यह पिछले कई सालों से चल रहा है.  यह बात तो समझ में आ रही है कि शेखर अग्रवाल और राज सिन्हा  में दूरी है.  भाजपा के इन सब हालातो के बीच विधायक राज सिन्हा  को सुंदरकांड का एक प्रसंग अचानक याद आ गया है.  उसे प्रसंग को उन्होंने अपने फेसबुक पर पोस्ट किया है.  इस पोस्ट में उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे हैं.  कहने  को तो प्रसंग सुंदरकांड का है लेकिन निशाना कई पर साधा गया है. शेखर अग्रवाल भी हो सकते है ,संजीव सिंह भी हो सकते है ,और -और लोग भी हो सकते है. धनबाद भाजपा महानगर अध्यक्ष के  चयन का विरोध करने वाले भी हो सकते है.    उन्होंने पोस्ट में क्या कहा है -उसे हम खूब बहू नीचे दे रहे हैं--

    सुंदरकांड में एक प्रसंग अवश्य पढ़ें .......

    “मैं न होता, तो क्या होता?”
    “अशोक वाटिका" में जिस समय रावण क्रोध में भरकर, तलवार लेकर, सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा, कि इसकी तलवार छिन  कर, इसका सर काट लेना चाहिये!

    किन्तु, अगले ही क्षण, उन्हों ने देखा 
    "मंदोदरी" ने रावण का हाथ पकड़ लिया !
    यह देखकर वे गदगद हो गये! वे सोचने लगे, यदि मैं आगे बड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि
     यदि मै न होता, तो सीता जी को कौन बचाता?बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मैं न होता, तो क्या होता ? 
    परन्तु ये क्या हुआ?
    सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया! तब हनुमान जी समझ गये,
     *कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं!

    आगे चलकर जब "त्रिजटा" ने कहा कि "लंका में बंदर आया हुआ है, और वह लंका जलायेगा!" तो हनुमान जी बड़ी चिंता मे पड़ गये, कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है,और त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है, एक वानर ने लंका जलाई है! अब उन्हें क्या करना चाहिए? *जो प्रभु इच्छा!

    जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े, तो हनुमान ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब "विभीषण" ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो  हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है!

    आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नहीं जायेगा, पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर, घी डालकर, आग लगाई जाये, तो हनुमान जी सोचने लगे कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता, और कहां आग ढूंढता? पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया! जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं, तो  मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

    इसलिये सदैव याद रखें, कि संसार में जो हो रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान  है! हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं! इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...मै न होता, तो क्या होता ?ना मैं श्रेष्ठ हूँ,ना ही मैं ख़ास हूँ,मैं तो बस छोटा सा,भगवान का दास हूँ॥

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 


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