दिल्ली में आदिवासी महा-रैली, डी-लिस्टिंग के लिए गिरिडीह से रवाना हुए 200

    दिल्ली में आदिवासी महा-रैली,  डी-लिस्टिंग के लिए गिरिडीह से रवाना हुए 200

    गिरिडीह(GIRIDIH): दिल्ली में 24 मई को होने वाली “गर्जना रैली” को लेकर झारखंड में बड़ा जनसैलाब देखने को मिला है. जनजातीय सुरक्षा मंच के बैनर तले गिरिडीह जिले से 200 से अधिक आदिवासी समाज के लोग इस रैली में शामिल होने के लिए दिल्ली के लिए रवाना हुए. शहर के सरस्वती शिशु विद्या मंदिर परिसर से यह जत्था पारंपरिक नारों, ढोल-नगाड़ों और उत्साह के बीच रवाना हुआ, जिससे माहौल पूरी तरह जोशीला बन गया.

    इस बड़े आयोजन के लिए दुमका जिले से विशेष ट्रेन की व्यवस्था की गई है, जो झारखंड के 8 जिलों से लोगों को लेकर दिल्ली पहुंचेगी. आयोजकों का अनुमान है कि इस रैली में हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग भाग लेंगे. यह कार्यक्रम आदिवासी अधिकारों और पहचान से जुड़े मुद्दों को लेकर एक बड़े आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है.

    रैली का प्रमुख मुद्दा “डी-लिस्टिंग” है, जिसे लेकर लंबे समय से मांग उठाई जा रही है. जनजातीय सुरक्षा मंच का कहना है कि इस विषय पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए. मंच से जुड़े विनोद सिंह ने कहा कि जब कोई व्यक्ति आदिवासी समुदाय से धर्म परिवर्तन कर ईसाई या मुस्लिम धर्म अपना लेता है, तो उसे अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षण का लाभ किस आधार पर दिया जा रहा है, यह एक गंभीर सवाल है.

    उन्होंने मांग की कि ऐसे मामलों पर स्पष्ट नीति बनाते हुए सरकार को विचार करना चाहिए, ताकि आरक्षण का लाभ केवल वास्तविक रूप से आदिवासी संस्कृति और परंपरा से जुड़े लोगों को ही मिले. उनका कहना है कि यह आंदोलन किसी के विरोध के लिए नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, अधिकार और संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा के लिए है.

    गिरिडीह से रवाना हुए जत्थे में युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी शामिल हैं. सभी में दिल्ली रैली को लेकर भारी उत्साह देखने को मिला. आयोजकों का दावा है कि यह रैली आदिवासी समाज की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठाने का काम करेगी और सरकार तक उनकी मांगों को पहुंचाएगी.यह कोई नया मुद्दा नहीं है. जनजातीय सुरक्षा मंच वर्षों से डी-लिस्टिंग की मांग उठाता आ रहा है. वर्ष 2024 में रांची के मोरहाबादी मैदान में पूर्व सांसद कड़िया मुंडा समेत कई नेताओं की मौजूदगी में “डी-लिस्टिंग महारैली” का आयोजन किया गया था.

    मंच का मानना है कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर लेते हैं, वे कई बार अपनी पारंपरिक भाषा, संस्कृति और रीति-रिवाजों से दूरी बना लेते हैं. वे सरहुल, सोहराय, करमा और बंदना जैसे आदिवासी त्योहारों में भाग नहीं लेते और न ही जनजातीय भाषाओं को दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं. ऐसे में उनके एसटी दर्जे और आरक्षण पर पुनर्विचार जरूरी है.

     



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