सरकारी शिक्षा का हाल बेहाल ! कड़ाके की ठंड में जमीन पर बैठ कर पढ़ने को मजबूर है मासूम

    सरकारी शिक्षा का हाल बेहाल ! कड़ाके की ठंड में जमीन पर बैठ कर पढ़ने को मजबूर है मासूम

    धनबाद(DHANBAD) : धनबाद में सरकारी शिक्षा का हाल देखिए शिक्षा मंत्री जी. बच्चे आज भी जमीन पर बैठकर ठिठुरते हुए पढ़ाई करते हैं. घर से बोरा लाकर बैठ पढ़ने की बातें तो सामने आई थी लेकिन सीमेंटेड जमीन पर बैठकर पढ़ने का मामला गुरुवार को धनबाद के बलियापुर प्रखंड में सामने आया है. इस कड़ाके की ठंड में बच्चे सीमेंटेड जमीन पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करते जांच में पाए गए है. मनरेगा की जांच के क्रम में बलियापुर के BDO जब  स्कूल में पहुंचे तो देखकर हैरत में पड़ गए. स्कूल में न बेंच थे और न डेस्क, बच्चे घर से बोरा भी लेकर नहीं आए थे.  

    बलियापुर का हाल सिस्टम को चिढ़ा रहा मुंह 

    बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ाई कर रहे थे. यह स्कूल बलियापुर प्रखंड में है. स्कूल का नाम है बाघमारा दनुडीह प्राथमिक विद्यालय, यहां एक से पांचवी तक के कुल 47 बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं. स्कूल में बेंच-डेस्क  कभी खरीदे गए थे या नहीं, इसका पता इसलिए भी नहीं चला कि प्रधान शिक्षक छुट्टी पर थे. सहायक अध्यापक स्कूल में मौजूद थे लेकिन BDO के प्रश्न का वह कोई भी उत्तर नहीं दे सके. BDO ने  इलाके के BEEO को इसकी सूचना दी और सहायक अध्यापक से शो कॉज  किया कि आखिर बच्चे फर्श पर बैठकर इस कड़ाके की ठंड में पढ़ाई क्यों कर रहे है. 

    सरकार दावा तो कई करती है लेकिन होता कुछ नहीं
     
    झारखंड सरकार शिक्षा में सुधार के लगातार दावे तो कर रही है लेकिन गुरुवार को बलियापुर में जो दिखा, वह सरकार को आईना दिखाने के लिए काफी था. ग्रामीण बच्चे किस हाल में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, वहां कैसी पढ़ाई हो रही होगी, यह तो सोचने वाली ही बात है. हर प्रखंड में शिक्षा अधिकारी होते हैं, मुख्यालय में भी अधिकारियों की फौज होती है, बावजूद कोई कार्यालय कक्ष छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहता. नतीजा होता है कि व्यवस्था में कभी कोई सुधार दिखता नहीं है. शिकायत होने पर तरह-तरह के बहाने बना लिए जाते है.  बलियापुर का यह मामला जनप्रतिनिधियों के लिए भी सवाल है. जनप्रतिनिधि भी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं ,कहते हैं कि दिन-रात वह क्षेत्र के लोगों की सेवा में लगे रहते हैं तो क्या किसी भी जनप्रतिनिधि ने कभी इस प्राथमिक विद्यालय मैं जाने की जरूरत नहीं समझी और गए तो किया क्या.

    रिपोर्ट: सत्यभूषण सिंह, धनबाद


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