1932 का खतियान: धनबाद के राजनीतिक दलों की बंध गई है घिग्घी, छटपटा तो रहे है लेकिन हैं गुम 

    1932 का खतियान: धनबाद के राजनीतिक दलों की बंध गई है घिग्घी, छटपटा तो रहे है लेकिन हैं गुम

    धनबाद (DHANBAD): 1932 के खतियान के आधार पर नियोजन नीति अगर लागू हो जाती है, तो धनबाद के 6 विधानसभा सीटों में से 4 पर इसका सीधा असर पड़ सकता है.  झरिया और धनबाद का गणित कुछ अलग है, लेकिन इस निर्णय का सीधा असर टुंडी, बाघमारा, निरसा और सिंदरी  विधानसभा सीटों पर पड़ेगा. टुंडी, सिंदरी, निरसा और बाघमारा में आदिवासी और मूल वासियों की संख्या अधिक है लेकिन धनबाद और झरिया में यह संख्या अपेक्षाकृत कम है.  झारखंड सरकार के निर्णय के बाद राजनीतिक दल के नेता पसोपेश में है, वह न खुलकर इसका समर्थन कर पा रहे हैं और नहीं इसका विरोध. 

    सिंदरी, निरसा और बाघमारा फिलहाल भाजपा के कब्जे में

    सिंदरी, निरसा और बाघमारा फिलहाल भाजपा के कब्जे में है, जबकि टुंडी से मथुरा महतो झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक हैं. धनबाद सीट भी भाजपा के पास है, जबकि झरिया सीट कांग्रेस को मिली है. राजनीतिक पंडित मानते हैं कि झारखंड मुक्ति मोर्चा की अगुवाई में चल रही सरकार का यह फैसला कम से कम टुंडी , सिंदरी निरसा  एवं बाघमारा के परिणाम को प्रभावित कर सकता है.  

    2024 के चुनाव में तो यह मुद्दा होगा ही 

    2024 के चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा तो इसे मुद्दा बनाएगा ही, राजनीतिक पंडित भी इस निर्णय को चुनाव से जोड़कर देख रहे है. अगर झरिया की बात की जाए तो 1977 के बाद यह सीट माफिया डॉन की ख्याति पाने वाले सूर्यदेव  सिंह के परिवार के पास ही रही.  एक बार आबो  देवी झरिया सीट से विजयी हुई.  2019 में भी भले यह सीट कांग्रेस की झोली में गयी है लेकिन विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह भी सूर्यदेव  सिंह के परिवार से ही आती हैं.  यह अलग बात है कि अभी सिंह मेंशन और रघुकुल में खटपट है.  2005 से आंकड़ों को देखें तो 2005 में झरिया सीट से बीजेपी के टिकट पर सूर्यदेव  सिंह की पत्नी कुंती देवी चुनाव जीती थी.   2009 में भी कुंती देवी ही विधायक बनीं.  2014 में कुंती देवी अपने बेटे के लिए सीट छोड़ दी और संजीव सिंह बीजेपी के विधायक बने.  फिर 2019 में कांग्रेस की टिकट पर पूर्णिमा नीरज सिंह विधायक बनी है.  इसी तरह अगर धनबाद विधानसभा  सीट की बात की जाए तो 2005 में बीजेपी के टिकट पर पशुपतिनाथ सिंह विजयी हुए थे जबकि 2009 में कांग्रेस के मन्नान मलिक को जीत मिली थी.  लेकिन फिर 2014 में राज सिन्हा बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीते और 2019 में भी उन्हीं को जीत मिली. 

    बाघमारा का भी परिणाम देख लीजिये 
     
    इधर, बाघमारा की भी चर्चा कर लेते हैं तो 2005 में जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर जलेश्वर महतो चुनाव जीते थे, हालांकि 2000 में भी समता पार्टी के टिकट पर उन्हें ही विजय  मिली थी. ढुल्लू महतो  2009 में रखंड विकास मोर्चा के टिकट पर चुनाव जीते ,फिर 2014 में बीजेपी में शामिल हो गए और बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीते.  2019 में भी वही विधायक हैं और यह जीत  बीजेपी के टिकट पर ही मिली है. राजनितिक पंडित मानते है कि सरकार के इस निर्णय का धनबाद में मिलाजुला असर देखने को मिल रहा है. कोयलांचल की राजनीति में भी सरकार के इस निर्णय का व्यापक असर पड़ना तय है.  धनबाद जिले के छह में से चार विधानसभा सीटों पर यह मुद्दा अगले चुनाव में सबसे अहम होगा.  इन चार में से तीन सीटें अभी भाजपा की झोली में है जबकि टुंडी सीट से सत्ताधारी दल के विधायक है. 


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