झारखंड में कई भाषाएं विलुप्ति के कगार पर, जानिये बचाने के क्या हो रहे सरकारी प्रयास

    झारखंड में कई भाषाएं विलुप्ति के कगार पर, जानिये बचाने के क्या हो रहे सरकारी प्रयास

    रांची (RANCHI): भाषा की भी जिंदगी होती है. उसकी संस्कृति होती है. परंपरा होती है. और उसका संघर्ष होता है. दुनियाभर में करीब 2000 भाषा और बोली अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही हैं. ऐसा यूनिसेफ की एक रिपोर्ट कहती है. भाषा की विलुप्ति के मामले में भारत अव्वल है, तो दूसरे नंबर पर अमेरिका और तीसरे नंबर पर इंडोनेशिया है. एक आंकड़े को सही मानें तो पिछले 50 साल में देश में करीब 20 फीसदी भाषाएं विलुप्त हो गयी हैं. पीपुल्स लिंग वेस्टिंग ऑफ इंडिया के सर्वेक्षण के मुताबिक देश में 800 भाषाएं बोली जाती हैं. इसमें से 32 जनजातीय भाषा झारखंड की हैं, जिसमें से कई विलुप्त हो चुकी हैं.

    कुछ ही सालों में दुलर्भ हो जाएंगी ये भाषाएं

    असुर, सौरिया, पहाड़िया, परहिया, कोरबा, बिरजिया, बिरहोर और सबर जैसी भाषा आदिम जनजाति से जुड़ी हैं. ये भाषा और बोली विलुप्ति के कगार पर है. सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड के रिसर्च के मुताबिक तुरी के 400-500, बिरिजिया के 6700, बिरहोर के 6000, असुर के 20 हजार और मालतो भाषा बोलने वाले करीब 20 हजार ही लोग रह गए हैं.

    कोरबा, सबर और परहिया की पुस्तकें

    सरकारी स्तर पर विलुप्त हो रही भाषा के संरक्षण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं. जनजातीय संस्कृति और परंपरा के संरक्षण के लिए बना डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान भी इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है. कोरबा, सबर और परहिया भाषा की पुस्तकें प्रकाशित होने जा रही हैं. पहली बार इन जनजातीय भाषाओं के व्याकरण से लेकर गद्य-पद्य की पुस्तकें तैयारी की गयी है.

    कई सालों से झारखंड सेंट्रल यूनिवर्सिटी कर रही रिसर्च

    राज्य में किन-किन जनजातीय भाषाओं के बोलने वाले कितने लोग बच गए हैं, इसका रिसर्च सर्च झारखंड सेंट्रल यूनिवर्सिटी पिछले सात सालों से करा रही है, ताकि इसके बचाव के लिए कोई सार्थक योजना बनाई जा सके. यह रिसर्च कहता है कि तुरी, बिरिजिया, बिरहोर, असुर और मालतो भाषा खत्म होने के कगार पर है. इन भाषाओं के लोगों की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है. इन भाषाओं का असर गुमला, लातेहार और चैनपुर के सुदूरवर्ती इलाकों में हैं. इन भाषाओं के विकास के लिए शब्दकोष तैयार किए जा रहे हैं. प्रो चामू कृष्णा शास्त्री के नेतृत्व में कमेटी का भी गठन किया गया है. जिनकी मदद से इन भाषाओं के शब्दों को हिन्दी में परिवर्तित कर जन सामान्य बनाने का प्रयास किया जा रहा है.

    जिलावार कहां कौन सी भाषा 

    जिला      जनजातीय भाषा

    रांची      कुडुख, खड़िया, मुंडारी

    खूंटी      कुडुख, खड़िया, मुंडारी

    सरायकेला  हो, भूमिज, मुंडारी, संताली

    लातेहार    कुडुख, असुर

    पलामू     कुडुख, असुर

    गढवा     कुडुख

    दुमका     संताली, माल्तो

    जामताडा   संताली

    साहेबगंज   संताली, माल्तो

    पाकुड     संताली, माल्तो

    गोड्डा      संताली, माल्तो

    हजारीबाग   संताली, कुडुख, बिरहोर

    रामगढ     संताली, कुडुख, बिरहोर

    चतरा      संताली, कुडुख, बिरहोर, मुंडारी

    प.सिंहभूम  हो, भूमिज, मुंडारी, कुडुख

    गुमला      कुडुख, खड़िया, असुर, बिरहोर

    सिमडेगा    खड़िया, मुंडारी, कुडुख

    पू.सिंहभूम  हो, भू​मिज, मुंडारी, कुडुख, संताली

    कोडरमा   संताली, कुरमाली, खोरठा

    बोकारो     संताली, नागपुरी, कुरमाली, खोरठा

    धनबाद     संताली, नागपुरी, कुरमाली, खोरठा

    गिरिडीह    संताली, कुरमाली, खोरठा

    देवघर      खोरठा, अंगिका   

     

     


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