राज्यसभा चुनाव और हॉर्स ट्रेडिंग को लेकर कुख्यात रहा है झारखंड, राज्य से ज्यादा बाहरी लोगों का रहा है कब्जा

    राज्यसभा चुनाव और हॉर्स ट्रेडिंग को लेकर कुख्यात रहा है झारखंड, राज्य से ज्यादा बाहरी लोगों का रहा है कब्जा

    TNP DESK- राज्यसभा चुनाव में "हॉर्स ट्रेडिंग" के लिए झारखंड कुख्यात रहा है.  चाहे 2012 का मामला हो अथवा 2016 का, झारखंड हमेशा से चर्चा में रहा है. .  जानकार सूत्रों के अनुसार 2016 में संख्या बल की  कमी के बावजूद भाजपा के दूसरे उम्मीदवार की जीत हुई थी और इस जीत ने विवादों को जन्म दिया था.  झारखंड में दो सीटों के लिए 18 जून को मतदान होना है.  इसके बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर "हॉर्स ट्रेडिंग" की आशंका जताई है.  झामुमो  की ओर से जारी पत्र में कहा गया है कि गठबंधन के पास दोनों सीट जीतने के लिए पर्याप्त विधायक हैं ,जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन( एनडीए) के पास संख्या बल कम है.  ऐसे में भाजपा अपना उम्मीदवार उतारने के बाद विधायकों को प्रभावित करने के लिए आर्थिक प्रलोभन, बाहरी दबाव का इस्तेमाल कर सकती है.  झामुमो ने चुनाव आयोग से निष्पक्ष, पारदर्शी और भय  मुक्त माहौल में चुनाव कराने की मांग की है.  

    भाजपा ने भी एक सीट पर उम्मीदवार देगी 

    इधर भाजपा ने एक सीट पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है.  हाल ही में हुई बैठक में इस पर चर्चा भी हुई है.  भाजपा और उसके सहयोगी दल के पास 24 वोट है.  और जीत के लिए अतिरिक्त वोट जुटाने  की कोशिश हो सकती है.   भाजपा का कहना है कि लोकल उम्मीदवार को ही पार्टी उतारेगी।  अभी तक किसी दल ने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है.  यह  अलग बात है कि झामुमो एक सीट पर तो अपने उम्मीदवार की जीत पक्की कर लेगा, लेकिन दूसरी सीट पर उसे गठबंधन के सभी दलों की जरूरत होगी।  गठबंधन के पास कुल 56 वोट हैं.   एनडीए को उम्मीदवार जिताने  के लिए चार वोटो की जरूरत होगी।  ऐसे में क्या खेल होगा ,यह देखने वाली बात है.  कांग्रेस के विधायक क्या करेंगे, इस पर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता है.  दरअसल, गठबंधन में कांग्रेस और झामुमो  में सामंजस्य की कमी दिख रही है और इसी का लाभ भाजपा उठाने की कोशिश कर सकती है.  देखना दिलचस्प होगा कि आगे खेल क्या होता है? 

    उम्मीदवारों के नाम घोषित हने के बाद और बढ़ेगी सरगर्मी 

    उम्मीदवारों के नाम अभी घोषित नहीं हुए हैं, घोषित होने के बाद क्या होगा, यह कहना फिलहाल कठिन दिख रहा है.  चर्चा तो तेज है कि किसी उद्योगपति को भी महागठबंधन उम्मीदवार बना सकता है.  जिसका सपोर्ट झामुमो  और कांग्रेस दोनों करें ,अगर हम झारखंड विधानसभा की स्थिति को देखें तो कुल सीट  81  हैं ,सत्ता पक्ष के झामुमो  के पास 34, कांग्रेस के पास 16, राजद  के पास चार ,माले के पास   दो विधायक हैं.  तो भाजपा के पास 21, आजसू  के पास एक, जदयू के पास एक, लोजपा  के पास एक विधायक हैं.  जेएलकेएम के एक विधायक है.  यह  पार्टी किसका समर्थन करेगी,यह अभी तक साफ नहीं हुआ है.  इधर, यह अभी कहा जाता है कि झारखंड में बाहरी लोगों का राज्यसभा सीट  पर कब्जा रहा है.  ऐसे में पुराने इतिहास को देखते हुए कहा जा सकता है कि 2026 के चुनाव में भी कोई ना कोई खेल हो सकता है. 
     
    कई बाहरी और गैर झारखंडी रह चुके हैं  सदस्य 

    अब तक के इतिहास को देखा जाए तो झारखंड के राज्यसभा संसद के रूप में कई बाहरी या गैर झारखंडी अथवा उद्योगपतियों का कब्जा रहा है.  ऐसे में एसएस अलहुवालिया  ,एमजे अकबर, प्रेमचंद गुप्ता, परिमल नाथवानी, केडी सिंह ,दिग्विजय सिंह का नाम गिनाया  जाता है.  दरअसल झारखंड के गठन के बाद विभिन्न राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक समीकरण साधने के लिए बाहरी लोगों को झारखंड कोटे से राज्यसभा भेजने का काम किया है.  एस एस. अहलूवालिया मूल रूप से पश्चिम बंगाल/दिल्ली से ताल्लुक रखते हैं और भाजपा के टिकट पर झारखंड से राज्यसभा सांसद रह चुके हैं एम. जे. अकबर  मुख्य रूप से दिल्ली/उत्तर प्रदेश से हैं, को भाजपा ने झारखंड से राज्यसभा भेजा था. प्रेम चंद गुप्ता  राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के वरिष्ठ नेता प्रेम चंद गुप्ता बिहार से आते हैं, लेकिन वे झारखंड से राज्यसभा सांसद चुने गए थे. 

    पारिमल नथवानी  दो बार रहे झारखंड से राज्यसभा सदस्य 

    पारिमल नथवानी मूल रूप से गुजरात के रहने वाले प्रमुख उद्योगपति  झारखंड से लगातार दो बार  राज्यसभा सांसद रहे हैं.    चंडीगढ़/दिल्ली के व्यवसायी कंवल दीप सिंह को झारखंड से राज्यसभा भेजा गया था.   कांग्रेस पार्टी की नेत्री मेबल रेबेलो मूल रूप से महाराष्ट्र/छत्तीसगढ़ से थीं, जिन्होंने झारखंड का प्रतिनिधित्व किया था. जनता दल (यू) के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह मूल रूप से बिहार से थे और उन्हें झारखंड कोटे से राज्यसभा सांसद चुना गया था. 

    झारखंड को क्यों कहा जाता है राजनीति की प्रयोगशाला 

    यह बात भी सच है कि झारखंड को राजनीति का प्रयोगशाला भी कहा जाता है.  एक निर्दलीय विधायक का मुख्यमंत्री बनने का इतिहास झारखंड के पास ही है.  यह बात भी सच है कि झारखंड में पहली बार 2014 में रघुवर दास की सरकार ने 5 साल तक निर्विघ्न सरकार चलाई थी.  उसके बाद 2019 में भाजपा को अपदस्त होना पड़ा था और हेमंत सोरेन के नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी।  यह सरकार भी 5 साल तक चली, उसके बाद फिर 2025 में गठबंधन की सरकार बनी है, इस  गठबंधन को भी झारखंड में प्रचंड बहुमत है.



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