झारखंड निकाय चुनाव: क्या कांग्रेस चुनाव में अलग राह पकड़ेगी, क्यों चुनाव से पीछे हट रही सरकार, पढ़िए इस रिपोर्ट में

    झारखंड निकाय चुनाव: क्या कांग्रेस चुनाव में अलग राह पकड़ेगी, क्यों चुनाव से पीछे हट रही सरकार, पढ़िए इस रिपोर्ट में

    धनबाद(DHANBAD): झारखंड में निकाय चुनाव को लेकर कांग्रेस में तो हलचल दिख रही है, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा और राजद में शांति बनी हुई है.सवाल उठता है कि कांग्रेस क्या निकाय चुनाव में अलग राह पकड़ेगी.?कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के राजू ने अभी हाल ही में रांची में कहा कि निकाय चुनाव में सहमति के आधार पर पार्टी एक ही उम्मीदवार खड़ा करेगी. प्रदेश कांग्रेस  निकाय चुनाव में अपनी ताकत दिखाने में जुट गई है. सर्वसम्मति से एक उम्मीदवार बनाने की कवायत शुरू कर दी गई है. प्रदेश स्तर से अलग-अलग निकायों के लिए संभावित प्रत्याशियों के नाम मांगे जाएंगे. इसके बाद उनकी जीत और हार की संभावना खोजी जाएगी. 

    कांग्रेस वार्ड पार्षद से लेकर मेयर और डिप्टी मेयर प्रत्याशी तय करेगी 

    वार्ड पार्षद से लेकर मेयर और डिप्टी मेयर तक के पद के लिए नाम का चयन होगा. पार्टी के अंदर इसे लेकर घमासान नहीं हो, इसके रास्ते निकाले जाएंगे. खैर, यह तो है कांग्रेस  की बात, लेकिन पूरे झारखंड में 32 निकाय चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा अभी चुप है. झारखंड में निकाय चुनाव नहीं होने से प्रदेश को भी नुकसान है. केंद्र ने रांची और धनबाद का पैसा रोक दिया है. जानकारी के अनुसार वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए केंद्र सरकार ने धनबाद और रांची के लिए फंड तो आवंटित किया, लेकिन यह कहकर देने से इनकार कर दिया कि नगर निकाय चुनाव नहीं होने से राशि रोकी जा रही है.

    धनबाद और रांची के लिए केंद्र आवंटित राशि का क्या होगा 
     
    शहर को प्रदूषण मुक्त करने के लिए, हवा को स्वच्छ बनाने के लिए केंद्र सरकार ने धनबाद नगर निगम को 94.48 करोड़ और रांची नगर निगम को 20.25 करोड रुपए का आवंटन किया था.अब तो चुनाव के बाद ही नगर निगम इस राशि का उपयोग कर पाएगा. इधर, धनबाद नगर निगम बोर्ड के भंग हुए 5 साल पूरे हो गए. 20 जून 2020 को नगर निगम की पुरानी कमेटी का कार्यकाल समाप्त हो गया था. 5 साल में चुनाव नहीं हुआ. इसको लेकर न सरकार गंभीर हुई और ना धनबाद के जनप्रतिनिधि दबाव बना पाए. उसके बाद तो शहर में सड़क ,नाली और सफाई जैसे मुद्दों पर नगर निगम में आवाज बुलंद करने वाला कोई नहीं रहा. अधिकारियों के जिम्मे  नगर निगम पिछले 5 सालों से चल रहा है. नगर निगम के पूर्व  पार्षद पिछले दो-तीन साल से चुनाव कराने के लिए धनबाद से रांची तक विरोध कर चुके हैं. लेकिन कार्रवाई नहीं हुई है. 

    नगर निगम चुनाव नहीं होने से पार्षदों के अधिकार खत्म हो गए है 

    नगर निगम चुनाव नहीं होने से पार्षदों के अधिकार छीन लिए गए हैं. वार्ड में रहने वाले लोग आज भी पूर्व पार्षदों को ही पार्षद मानकर शिकायत करने पहुंचते हैं .लेकिन पार्षद मजबूर है.वार्ड के लोगों को हर छोटे-बड़े काम के लिए नगर निगम की दौड़ लगानी पड़ती है. सरकार की ओर से ओबीसी आरक्षण देने के लिए वार्ड स्तर पर सर्वेक्षण भी कराया गया था. सर्वे कराए हुए लगभग 3 महीने बीत गए. लेकिन निगम चुनाव की शुरुआत नहीं दिख रही है. यह तो हुआ धनबाद नगर निगम का हाल, लेकिन कांग्रेस चुनाव को लेकर सक्रिय हो गई है .कांग्रेस सरकार में हिस्सेदार है. उसके चार विधायक मंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस की सक्रियता भी कई सवालों को जन्म देती है. क्या निगम के चुनाव में गठबंधन का धर्म टूटेगा. अगर नहीं तो फिर कांग्रेस अलग तैयारी के मूड में क्यों है. यह एक बड़ा सवाल है.

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 


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