ड्यूटी पर जाने से पहले बच्चों को यहां छोड़ जाते हैं मजदूर, जमशेदपुर में ऐसे संवर रहा भविष्य

    ड्यूटी पर जाने से पहले बच्चों को यहां छोड़ जाते हैं मजदूर, जमशेदपुर में ऐसे संवर रहा भविष्य

    जमशेदपुर (JAMSHEDPUR): जमशेदपुर शहर में एक ऐसा स्कूल है जहां सिर्फ मेहनत मजदूरी करने वालों के बच्चे पढ़ते हैं. बच्चों को इस पाठशाला ( गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू स्कूल) में नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है. यह स्कूल उन अभिभावकों के लिए वरदान साबित हो रहा है जो सुबह रोजगार के लिए घर से निकलते हैं और बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं. ऐसे अभिभावकों के लिए करनडीह स्थित दिशोम जाहेरथान उम्मीद की एक मजबूत किरण बनकर उभरा है. यहां हर सुबह एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है. मजदूरी पर जाने वाले माता-पिता अपने बच्चों का हाथ थामे इस पाठशाला तक पहुंचते हैं और उन्हें सुरक्षित माहौल में छोड़कर अपने काम पर निकल जाते हैं. इस स्कूल में 50 से अधिक बच्चे यहां नियमित रूप से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. खास बात यह है कि बच्चों को ओलचिकी के साथ-साथ हिंदी और अन्य भाषाओं में भी पढ़ाया जाता है, जिससे उनकी बुनियादी शिक्षा मजबूत हो रही है. 

     

    बच्चों को अनुशासन भी सिखाया जाता है
    हर सुबह मजदूरी पर जाने से पहले अभिभावक अपने बच्चों को इस पाठशाला में छोड़ जाते हैं. यहां उनके दिन की शुरुआत सीखने के माहौल में होती है. यहां सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि अनुशासन, स्वच्छता और संस्कारों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है. शिक्षक बच्चों को किताबों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उन्हें जीवन के मूल्यों और जिम्मेदार नागरिक बनने की सीख भी देते हैं. बच्चों के लिए रोजाना नाश्ता और भोजन की व्यवस्था उनकी देखभाल को और मजबूत बनाती है. यह पहल आदिवासी समाज के सामूहिक प्रयास का उदाहरण है, जो आने वाली पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य की नींव रख रही है.

     

    शाम में बच्चों को घर ले जाते है माता-पिता
    सुबह से शाम तक बच्चे स्कूल में ही रहते है. पढ़ाई के साथ-साथ बच्चे खेलकूद भी करते है. शाम को जब माता-पिता अपनी ड्यूटी खत्म कर लौटते हैं तब बच्चों को स्कूल से अपने घर ले जाते है. दूसरे दिन सुबह फिर बच्चों को स्कूल पहुंचाते है. इस व्यवस्था से मजदूरों को यह भरोसा रहता है कि उनके बच्चे सुरक्षित हैं और उनका भविष्य भी संवर रहा है. दिशोम जाहेरथान की यह पहल न सिर्फ शिक्षा का प्रसार कर रही है, बल्कि समाज के कमजोर वर्ग के बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने का काम भी कर रही है. आदिवासी समाज के प्रबुद्ध लोग और शिक्षकों के सहयोग से यह पाठशाला लगातार आगे बढ़ रही है और मजदूर परिवारों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रही है. ऐसे प्रयास यह साबित करते हैं कि अगर सही दिशा और सहयोग मिले, तो सीमित संसाधनों में भी बच्चों के सपनों को नई उड़ान दी जा सकती है. 

    बच्चों को शिक्षित बनाना है लक्ष्य
    करनडीह स्थित दिशोम जाहेरथान के सचिव रविंद्र मुर्मू ने बताया कि आदिवासी बच्चों को शिक्षित बनाना कमेटी का मुख्य लक्ष्य है. अक्सर देखा जाता है कि मजदूर अपने बच्चों को ड्यूटी पर साथ ले जाते हैं. इसलिए जाहेरथान में ऐसी व्यवस्था की गई है, जहां वे अपने बच्चों को सुरक्षित छोड़कर मजदूरी कर सकें. यहां बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ खेलकूद की गतिविधियां भी कराई जाती हैं. करनडीह और आसपास के गांवों के मजदूरों के बच्चे इस पाठशाला में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.


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