कोयलांचल में अपराध का इतिहास: जाति का नेता कौन के लिए कैसे शुरू हुई थी सूर्यदेव सिंह -सत्यदेव सिंह में बर्चस्व की जंग

    कोयलांचल में अपराध का इतिहास: जाति का नेता कौन के लिए कैसे शुरू हुई थी सूर्यदेव सिंह -सत्यदेव सिंह में बर्चस्व की जंग

    धनबाद(DHANBAD) |  कोयलांचल में अपराध का इतिहास काल खंड के अनुसार बदलता रहा.  माफिया तो अब नहीं रहे, लेकिन माफिया का "यूथ विंग" अभी भी सक्रिय है.  बुजुर्ग बताते हैं कि 28 मार्च 1978 को बीपी सिन्हा  की हत्या के बाद सूर्यदेव सिंह ज्यादा निडर  महसूस करने लगे थे.  वह लगातार आगे बढ़ रहे थे.  समय के साथ सूर्यदेव सिंह की ताकत भी बढ़ रही थी.  अपने मजबूत विरोधियों को कमजोर करने के बाद सूर्यदेव सिंह छोटे प्रतिद्वंदियों के पीछे पड़ गए थे. इस क्रम में टकराहट भी होती थी.  कतरास के सत्यदेव सिंह का नाम भी उस वक्त खूब चल रहा था.  

    सूर्यदेव सिंह को यह बात हमेशा खटकती रहती थी ----

    बुजुर्ग लोग बताते हैं कि सत्यदेव सिंह कोलांचल में राजपूतों के सर्वमान्य नेता स्वीकार कर लिए गए थे.  सूर्यदेव सिंह को यह बात खटकती थी और वह सत्यदेव सिंह से यह "ताज" छीनना चाहते थे.  इसको लेकर कई बार टकराहटें  भी हुई.  माफिया के बीच लड़ाई की कहानी लंबी -चौड़ी है.सूर्य देव सिंह और सत्यदेव सिंह में कई बार टकराहट हुई.  सत्यदेव सिंह कोलांचल में "मालिक" कहे  जाते थे. उनके साथ अंगरक्षकों का एक लम्बा काफिला चलता था. लोग बताते हैं कि नाटे कद के सत्यदेव सिंह जब चलते थे तो उनके लिए रास्ता बनाया जाता था.  वह धनबाद जिला परिषद के अध्यक्ष रह चुके थे.  लेकिन सूर्यदेव सिंह के साथ उनकी टकराहट होती रहती थी. लोगो के अनुसार  दरअसल, जिस इलाके में सत्यदेव बाबू रहते थे, वहां भी कोलियरियों  की भरमार थी. 

    सत्यदेव बाबू के भाई विधायक, सांसद और बिहार में मंत्री भी रहे----
     
    उनके बड़े भाई शंकर दयाल सिंह विधायक, सांसद और बिहार में मंत्री भी रहे थे.  सत्यदेव सिंह की काफी चलती थी. सत्यदेव सिंह के पास राजनीतिक पहुंच बन गई थी. लेकिन उस वक्त सूर्यदेव सिंह राजनीतिक पहुंच की तलाश में थे. बाद में उन्होंने इसे  भी हासिल कर लिया था.  लोग बताते कि सत्यदेव सिंह के यहां  दरबार लगता था.  यह सब सूर्यदेव सिंह को अच्छा नहीं लगता था.  अब तक कोलियरियों  का राष्ट्रीयकरण भी हो चुका था.  सरकारी व्यवस्था के तहत कोयले का उत्पादन होने लगा था.  भारत कोकिंग कोल्  लिमिटेड माफिया के निशाने पर थी.  भारत कोकिंग कोल्  लिमिटेड में बालू ढुलाई , कोयला ढुलाई,कोयला लिफ्टिंग  तथा अन्य कार्यों की ठेकेदारी प्राप्त करने के लिए  टकराहट होती थी.  कोलियरियों  पर कब्ज़ा  की भी लड़ाई खूब होती थी.  उस समय रोड सेल से ही कोयले की ढुलाई  होती थी और बालू सप्लाई का बहुत बड़ा काम था.  बालू सप्लाई के काम को पाने के लिए सब एक दूसरे से लड़ते- झगड़ते थे. 

    एक -दूसरे के इलाके में प्रवेश करने पर होती थी मारकाट ----
     
    जिस इलाके में जिसकी दबंगता होती थी, वहां का टेंडर उन्ही  के लोगों को मिलता था.  एक तरह से कहा जाए तो सब अलग-अलग क्षेत्र बना लिए थे.  एक दूसरे के क्षेत्र में ठेकेदारी अथवा बालू का टेंडर लेने  पर मारपीट, खून -खराबा, कत्ल और हिंसा होती थी.  बोर्रागढ़  और कुस्तौर  इलाका सूर्यदेव  सिंह का गढ़ माना जाता था, तो कतरास- बाघमारा इलाके में सत्यदेव सिंह की खूब चलती थी.  इस समय कई अन्य लोगों का नाम भी माफिया की सूची में जुड़ गया था.  नवरंगदेव सिंह, उनके भाई रामचंद्र सिंह के नाम जुड़े  तो सकलदेव सिंह का नाम भी माफिया की सूची में दर्ज हो गया था.  सकलदेव सिंह भी एक कोण  बनाने की कोशिश करने लगे थे. सकलदेव सिंह की ताकत तब कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी , जब सूर्यदेव सिंह से अलग होकर रघुनाथ सिंह सकलदेव सिंह के साथ मिल गए थे.  अब टकराहट तीन गुटों में होने लगी थी.  एक गुट  सूर्यदेव सिंह का था, दूसरा गुट  सत्यदेव सिंह का था तो तीसरा दल   सकलदेव सिंह का भी तैयार हो चुका था. 



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