कोयलांचल का अपराधिक इतिहास : झरिया का एक साधारण युवक कैसे बन गया धनबाद का "कोयला किंग" 

    कोयलांचल का अपराधिक इतिहास : झरिया का एक साधारण युवक कैसे बन गया धनबाद का "कोयला किंग"

    धनबाद(DHANBAD): लोग बताते हैं कि कोयलांचल के अपराधिक इतिहास में एक समय में अस्तित्वविहीन उद्योगों के नाम पर कोयला आवंटन के खेल की भी बड़ी  भूमिका रही.   वैसे, तो कोयलांचल में कोयले के वैध  और अवैध कारोबार की चर्चा हमेशा होती रही है और यही वजह रही की दिशोम  गुरु शिबू सोरेन जब कोयला मंत्री बने थे, तो उन्होंने सहयोग समितियां बनाकर परित्यक्त  खदानों को देने की वकालत की थी.  हालांकि यह योजना फलीभूत  नहीं हुई.  क्योंकि कोयला खनन के लिए तकनीकी रूप से दक्ष लोगों की जरूरत थी.  चर्चा इसकी खूब हुई, लेकिन बाद में यह योजना  ठंडे बस्ते  में चली गई.  

    डीओ सिस्टम के बाद कैसे लागू  हुई ई  -ऑक्शन  व्यवस्था

    लोग बताते हैं कि पहले डिलीवरी ऑर्डर(डीओ ) कोयला भवन से निर्गत होता था .  उसमें भी कई झोल -झाल थे.   उसके बाद ही ई -ऑक्शन  व्यवस्था लागू हुई.  ई  -ऑक्शन  व्यवस्था के लागू होने से व्यवस्था पूरी तरह से बदल गई थी.  हालांकि उसके पहले अस्तित्वविहीन  उद्योगों के नाम पर "स्पॉन्सर्ड पेपर" का खेल खूब चलता था.  स्वर्गीय सुरेश सिंह राज्य सरकारों का "स्पॉन्सर्ड पेपर" बेचते- बेचते और कोयला लिफ्ट करते -कराते  कैसे "कोयला किंग" बन गए, इसकी भी एक अलग कहानी है.  झरिया का एक साधारण युवक  कैसे "कोयला किंग" बन गया, इसकी भी चर्चा कोयलांचल में गाहे -बेगाहे  खूब होती है.  बुजुर्ग बताते हैं कि कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद 1980 का साल रहा होगा।  सुरेश सिंह झरिया के कतरास मोड़ में रहते थे.  वहीं उनके पिता का निवास था.  उस समय झरिया में मनोहर सिंह भी रहा करते थे. 

     मनोहर सिंह भी झरिया में ही रहा करते थे 
     
    मनोहर सिंह के बारे में कहा जाता है कि "स्पॉन्सर्ड पेपर" के जुगाड़ में वह माहिर थे.  हालांकि बाद में उनकी उत्तर प्रदेश में किसी पेट्रोल पंप पर हत्या कर दी गई थी. लोग बताते हैं कि सुरेश सिंह उनके संपर्क में आए और फिर एक गुट  बनाकर  "स्पॉन्सर्ड पेपर" पर काम तेजी से शुरू हुआ.  जानकार बताते हैं कि उस समय यह  व्यवस्था थी कि राज्य सरकार कोयला कंपनियों को उद्योगों की सूची देकर बताती थी कि उनके राज्य में विभिन्न उद्योगों के लिए इतने टन कोयले की जरूरत है.  इसी को "स्पॉन्सर्ड पेपर" कहा जाता था.  लोग बताते हैं कि "स्पॉन्सर्ड पेपर" बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर तक के लिए निर्गत कराए जाते थे.  कई मामलों में खुलासा हुआ था कि उद्योग है ही नहीं, लेकिन उनके नाम पर कोयला का आवंटन किया जाता था.  ऐसे में कोयला उठाने वाले लोग खुद पैसा लगाकर कोयला उठाते थे अथवा कागजात ही बेच  देते थे. 

    तत्कालीन एसपी अनिल पालटा ने जाँच कराई  तो कैसे खुले मामले 

     धनबाद के एसपी जब अनिल पलटा थे, तो उन्होंने इस गोरखधंधे की गहनता  से जांच कराई।  जांच में पता चला था कि कई राज्यों के लिए जिन उद्योगों के नाम पर 'स्पॉन्सर्ड पेपर' निर्गत कराए गए हैं, वहां गाय- भैंसों का तबेला चलता है.  उस समय इसकी चर्चा खूब चली थी.  कई अस्तित्वविहीन  उद्योगों का आवंटन भी रद्द कर दिया गया था.  हालांकि एसपी अनिल पलटा की कार्रवाई के बाद धंधा कमजोर पड़ गया था.  लेकिन इस खेल को खत्म नहीं किया जा सका था.  कोयलांचल के कई लोगों ने "स्पॉन्सर्ड पेपर" के खेल में अकूत धन कमाए।  फिर इस काम में एक विशेष गुट  की तूती बोलने लगी.  फिर तो अन्य लोग भी इस ओर  मुड़े और उसके बाद  हालात बदलते चले गए.  लोगों से रंगदारी वसूलने का काम भी तेज होने लगा.  सुरेश सिंह भी तब तक बहुत ताकतवर हो गए थे और उन्हें "कोयला किंग" के नाम से जाना जाने लगा था.  7 दिसंबर 2011 को लुबी सर्कुलर रोड स्थित धनबाद क्लब में उनकी हत्या कर दी गई.



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