Coal City: बीसीसीएल का "पुराना  पाप" ही क्यों  बन  गया है बड़ी चुनौती ,क्यों भाग रहे बड़े -बड़े खरीदार ,अब आगे क्या!

    Coal City: बीसीसीएल का "पुराना  पाप" ही क्यों  बन  गया है बड़ी चुनौती ,क्यों भाग रहे बड़े -बड़े खरीदार ,अब आगे क्या!

    धनबाद(DHANBAD): क्या बीसीसीएल भी अब ईसीएल  की राह पर चल पड़ी है और अगर ऐसा हुआ तो देश ही नहीं ,दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी कोल इंडिया को बड़ा झटका लग सकता है.  कोयलांचल की आर्थिक दशा तो बिगड़ेगी  ही,  कोल्  इंडिया भी संकट में पड़ जाएगा.  क्योंकि कोकिंग कोल्  की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी बीसीसीएल ही है.  लेकिन अब बीसीसीएल को खरीदार नहीं मिल रहे है.  कोयला का स्टॉक बढ़ता जा रहा है.  बीसीसीएल पर कोयले की गुणवत्ता खराब देने के भी आरोप  लगते रहे है.  सरकारी संस्थान जब यह कह रहे हैं कि एक तो बीसीसीएल का कोयला महंगा है और दूसरा उसकी गुणवत्ता सही नहीं है.  तो यह समझना होगा कि क्या इसमें कोई "खेल "है. 

    क्या कभी आउटसोर्स कंपनियों की करतूत की जाँच होगी ?
     
    इस खेल में बीसीसीएल के निचले स्तर के अधिकारी और आउटसोर्सिंग कंपनियों में क्या कोई सांठगांठ  है? आउटसोर्सिंग कंपनियों से कोयला चोरी की बात अब पर्दे में नहीं रह गई है.  सब कुछ जग जाहिर है.  बीसीसीएल का लगभग 90% कोयला आउटसोर्सिंग कंपनियों के भरोसे उत्पादित होता है और आउटसोर्सिंग कंपनियां बीसीसीएल में अपनी समानांतर व्यवस्थाएं चलाती है.  कोयला चोरी और तस्करी तो बड़ी समस्या है ही, कोयला चोरी और तस्करी रोकने की दिशा में मैनेजमेंट को जो करना चाहिए, वह आज तक नहीं किया. राजनीति का हस्तक्षेप भी इसका एक बड़ा कारण  हो सकता है.

    सीआईएसएफ  का भारी बोझ आखिर किस काम के ?
     
    क्यों कि राजनीति कर न जाने कितने फर्श से अर्श पर पहुंच गए है. इधर , अपने कंधे पर सीआईएसएफ  का भारी बोझ लेकर कंपनी चलती रही और  कोयला चोरी और तस्करी होती रही.  अगर कंपनी के सीएमडी सार्वजनिक मंच से कोयला चोरी की बात को स्वीकार कर रहे हैं और उसे रोकने की दिशा में कदम उठाने की "हथजोरी " कर रहे हैं, तो इसका मतलब समझा जा सकता है कि  बीसीसीएल का "पुराना पाप" अब उसी के लिए खतरा बन गया है.  कोकिंग कोल्  उत्पादन में बीसीसीएल का कोई सानी नहीं है.  इधर, पता चला है कि ऊर्जा क्षेत्र का एक बड़ा उपक्रम एनटीपीसी ने बीसीसीएल से अपना कारोबारी संबंध तोड़ लिया है. 
     
    एनटीपीसी ने आखिर क्यों कारोबारी समझौता तोड़ लिया है ?
     
    एनटीपीसी ने बीसीसीएल का कोयला महंगा और गुणवत्ता खराब होने का हवाला देकर कोयला खरीदने से इनकार कर दिया है.   दोनों कंपनियों के बीच 12 अगस्त 2009 को फ्यूल  सप्लाई एग्रीमेंट हुआ था.  उसके तहत एनटीपीसी सालाना 3.6 मिलियन टन कोयला की खरीदारी बीसीसीएल से कर रहा था.  लेकिन पिछले दो महीने से खरीदना बंद कर दिया है.  अब एनटीपीसी ने बीसीसीएल  के बजाय कोल इंडिया की दूसरी सहायक  कंपनी महानदी कोलफील्ड लिमिटेड से कोयला लेने का प्रस्ताव दिया है.  बीसीसीएल से कोयले के खरीदार लगातार कम होते जा रहे है.  वेस्ट बंगाल  पावर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड ने पहले 3 मिलियन टन कोयला लेता था, पर उसने कोयला लेना बंद कर दिया है.  उत्तर प्रदेश में भी 2.5 मिलियन टन कोयला जाना बंद हो गया है.  बीसीसीएल की बिक्री प्रतिवर्ष 30 मिलियन टन  से घटकर 21 मिलियन टन पर पहुंच गई है.  डीवीसी ने भी कम करने का प्रस्ताव भेजा है.  आखिर क्या वजह है कि बीसीसीएल के खरीदार घटते जा रहे है. 

    ईसीएल की राह पर तो नहीं चल पड़ी है बड़ी ईकाई बीसीसीएल ?
     
    कोल इंडिया की दूसरी इकाई ईसीएल  आर्थिक संकट से जूझ रही है.  कर्मचारियों के वेतन तक में परेशानी हो रही है.  यह अलग बात है कि बीसीसीएल भी कभी बीआईएफआर में भी थी, लेकिन उसके बाद वह लगातार ऊंचाई की सीढ़ियां चढ़ती गई.  और मुनाफा कमाती  गई .  लेकिन एक बार फिर सवाल बड़ा हो गया है कि क्या बीसीसीएल का "पाप" अब उसके लिए बड़ी चुनौती बन गया है.  यह अलग बात है कि केंद्र सरकार ने कोयला सेतु नीति को मंजूरी दे दी है.  दावा किया गया है कि कोल्  सेतु नीति को मंजूरी देकर कोयला सप्लाई  व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता लाने की बड़ी कोशिश की गई है.  लेकिन सवाल यह भी है कि जिस ढंग से व्यवस्थाएं चल रही है, उसमें यह नई नीति कितनी कारगर होगी, यह देखने वाली बात हो सकती है. 

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो 


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