कोयला आधारित उद्योग: 2005 के बाद क्यों और कैसे बिगड़ने लगी हालत, भविष्य से अब कैसी उम्मीद!


धनबाद(DHANBAD): कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद निजी खान मलिक सड़क पर आ गए थे. कोलियरी के नाम की सारी संपत्ति सरकार ने अधिग्रहित कर ली थी. उसके बाद कोलियरी मालिकों के परिवार के सामने संकट पैदा हो गया था. फिर तो कोलियरी मलिक के परिजन उद्योग- धंधे का रास्ता खोजा और धनबाद कोयलांचल में लगभग डेढ़ सौ हार्ड कोक उद्योग धीरे-धीरे स्थापित हो गए. राजगंज से लेकर बंगाल के बॉर्डर तक सड़क के दोनों किनारे ऊंची -ऊंची चिमनियां धुवां उगलने लगी और हार्ड कोक भट्ठा चलने लगे. इसमें हार्ड कोक तैयार होने लगे. हार्ड कोक की सप्लाई दूसरे प्रदेशों में होने लगी और यह बाजार चल निकला। लेकिन 2005 के आसपास समय में पलटा खाया और हार्ड कोक उद्योग के बुरे दिन शुरू हो गए.
उद्योग मालिकों को कोयले के लिए चिरौरी करनी पड़ी
उसके बाद तो हार्ड कोक मालिकों को कच्चे माल यानी कोयले के लिए चिरौरी करनी पड़ती रही. लेकिन उनकी कोई नहीं सुना । नतीजा हुआ कि 70% से अधिक हार्डकोक उद्योग बंद हो गए. अभी जो चल रहे हैं, उनकी भी हालत सही नहीं है. दरअसल, 2005 में कोयला उद्योग में ई -ऑक्शन सिस्टम आया. लिंकेज व्यवस्था खत्म हो गई. अब हार्ड कोक उद्योग अथवा किसी भी कोयला आधारित उद्योग को ट्रेडरों के साथ बोली लगानी पड़ी. कोयले की दर भी अधिक हो गई. उनकी तमाम सहूलियतें बंद कर दी गई. नतीजा हुआ कि तैयार माल में नुकसान होने लगा और धीरे-धीरे उद्योग बंद होने लगे. यह अलग बात है कि जो लोग चोरी के कोयला का उपयोग करने में माहिर हैं , वह तो इस दौर में भी नए-नए उद्योग खड़े कर लिए. लेकिन जो इमानदारी से कारोबार करना चाहते थे, वह धंधे से मुंह मोड़ लिए.
कई उद्योग मालिक धनबाद छोड़ दूसरे प्रदेश में कारबार करने लगे
कुछ के परिवार तो धनबाद छोड़ दिए, दूसरे प्रदेशों में जाकर आज भी धंधा- व्यवसाय कर रहे हैं. लेकिन उनका दर्द बना हुआ है. बात करने पर वह कहते हैं कि धनबाद उनके रहने लायक नहीं रहा. वह करें भी तो क्या करें, उद्योग चलता नहीं है, कोयला मिलता नहीं है, फिर धनबाद में रहकर क्या करेंगे? दूसरी ओर इस उद्योग के बंद होने से रोजगार की समस्या भी खड़ी हो गई. इस उद्योग में एक समय में लगभग डेढ़ से दो लाख लोग प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पा रहे थे. लेकिन धीरे-धीरे वह खत्म हो गया. हार्ड कोक उद्योगों में काम करने वाले या तो मजदूरी करने लगे या फिर साइकिल से चोरी का कोयला ढोने लगे. ऐसी बात नहीं है कि कोयलांचल के कोयला आधारित उद्योगों को कोयला देने के लिए मांग नहीं की गई. कई स्तरों पर मांग हुई, धनबाद से दिल्ली तक मामला गया.
2005 के बाद कोयला आधारित उद्योगों की हालत बिगड़ने लगी
कोयला आधारित उद्योग राहत की मांग करते रहे, लेकिन उनकी मांग को अनसुनी कर दी गई. नतीजा हुआ की 2005 के बाद इस उद्योग की हालत बिगड़ गई और अब तो इन उद्योगों के बंद होने का असर धनबाद की आर्थिक स्थिति पर भी दिखने लगा है. कई बार यह आवाज उठी कि -- हमारा कोयला और हम ही कोयले के लिए चिरौरी करें, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई और अब यह उद्योग लगभग मरणासन्न हो गए हैं. यह बात अलग है कि कोयलांचल में कोयला चोरी और तस्करी का धंधा बढ़ा तो कुछ नए-नए हार्ड कोक उद्योग भी खड़े हुए हैं. इन उद्योगों में चोरी का कोयला खपाया जाता है. जिसका खुलासा कई बार हो चुका है, लेकिन साफ -सुथरा धंधा करने वाले अब अपना कारोबार समेट लिए हैं.
रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो
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