धनबाद जिला कांग्रेस : भीतरिया गुटबाजी से हिल गई नींव

    धनबाद जिला कांग्रेस : भीतरिया गुटबाजी से हिल गई नींव
    धनबाद (DHANBAD) :  धनबाद जिला में  कांग्रेस 'तब और अब' में बहुत कमजोर दिख रही है. इसका एक बड़ा कारण है कि कोई किसी का नेतृत्व स्वीकारने को तैयार नहीं है. पद पर बैठे लोग जगह छोड़ने को तैयार नहीं हैं और सेकंड या थर्ड लाइनर को सही प्रोत्साहन नहीं मिलता.  एक वह भी वक्त था जब कोयलांचल में सिर्फ कांग्रेस ही कांग्रेस थी और आज एक झरिया विधानसभा क्षेत्र की बात छोड़ दें तो कांग्रेस के कोई भी प्रतिनिधि चुनाव नहीं जीत सके.  यह बात अलग है कि झरिया सीट पर कांग्रेस की जीत की वजह कांग्रेस की लोकप्रियता नहीं बल्कि धनबाद के बाहुबली घराने सिंह मेनशन के बीच पड़ी दरार है.  2005 में सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती देवी झरिया सीट से  बीजेपी की टिकट पर चुनाव जीती थी.  उसके बाद 2009  में भी कुंती देवी ने ही चुनाव जीता. 2014 में उनके बेटे संजीव सिंह झरिया से विधायक बने.  लेकिन 2019 आते-आते झरिया सीट पर सूर्यदेव  सिंह के भतीजे स्वर्गीय नीरज सिंह की पत्नी पूर्णिमा नीरज सिंह ने विजय पताका फहराया.

    इंटक के साथ  कांग्रेस भी होती गई कमजोर

     कोयलांचल में कांग्रेस को जानने वाले बताते हैं कि कोयला खदानों में काम करने वाली मजदूर यूनियन इंटक जैसे-जैसे कमजोर हुई , कांग्रेस कमजोर होती चली गई.  एक तरह से कहा जाए तो धनबाद में कांग्रेस का आधार ही  इंटक  थी.  बात भी बहुत हद तक सही है क्योंकि कांग्रेस के सभी बड़े नेता इंटक की राजनीति करते थे. एक बात और कही जाती है कि चंद्रशेखर दुबे उर्फ ददई दुबे 2004 में धनबाद लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस को जितना मजबूत किए थे, उतना ही इंटक  के साथ उनके विवाद के बाद कांग्रेस  कमजोर हो गई.  वैसे तो कांग्रेस  में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है. लेकिन ददई दुबे और इंटक  के बीच विवाद का बहुत बुरा असर धनबाद जिला कांग्रेस पर पड़ा है.
     
    एक वह जमाना था और एक अब का समय है
     
    लोग याद करते हैं कि एक जमाना बीपी सिन्हा का था. जमाना रंग लाल चौधरी का भी था. रामनारायण शर्मा कद्दावर नेता थे. शंकर दयाल सिंह की तूती बोलती थी. बिहार के पूर्व सीएम बिंदेश्वरी दुबे हो या राजेंद्र सिंह अथवा ओपी लाल ,एस के राय सभी इंटक की बदौलत ही कांग्रेस की राजनीति करते थे. 90 के दशक में लाल झंडा छोड़कर कांग्रेस में आए के एस  चटर्जी को धनबाद जिला कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था.  किसी जांच रिपोर्ट पर नाखुश होकर वह  कांग्रेस को छोड़ दिया.  जिला अध्यक्ष का चार्ज  उन्होंने बृजेंद्र प्रसाद सिंह को दे दिया.  फिर  मन्नान मल्लिक धनबाद जिला कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए.  उसके बाद इंटक के  विवाद का ही असर हुआ कि राजेंद्र सिंह के समर्थक  ब्रजेन्द्र  प्रसाद सिंह को फिर जिला अध्यक्ष बनाया गया, अभी भी वह जिला अध्यक्ष की कुर्सी पर बने हुए हैं. वर्तमान में जदयू छोड़कर कांग्रेस में आए जलेश्वर महतो प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. मन्नान मल्लिक अभी भी इंटक से जुड़े हुए हैं और कांग्रेस की राजनीति में हैं तो जरूर लेकिन उम्र उनकी सक्रियता में बाधक बन रही है. धनबाद के कोंग्रेसियों की 'ताकत' और भीतरिया गुटबाजी का केवल एक ही उदहारण काफी है कि सरकार में रहते  कांग्रेस ऑफिस में ताला  लटक रहा है. पुराने कांग्रेस के लोग मानते हैं कि जिस नए लोगों की स्वीकार्यता हो, वह जिम्मेवारी लेने में सक्षम हो और अपने कार्य की अच्छे या किसी चूक की जिम्मेवारी लेने का साहस रखता हो, उसे आगे बढ़ाना होगा. त्याग और तपस्या की राजनीति को फिर से वापस लानी होगी. तभी धनबाद में कांग्रेस अपनी खोई प्रतिष्ठा पा सकती है. इंटक के विवाद को भी खत्म करना होगा.

     
     


     

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