ऐसे होगा फैमिली प्लानिंग ऑपरेशन तो कैसे कम होगी देश की जनसंख्या हुजूर !

    ऐसे होगा फैमिली प्लानिंग ऑपरेशन तो कैसे कम होगी देश की जनसंख्या हुजूर !

    कोडरमा (KODERMA) : फैमिली प्लानिंग के लिए अस्पताल में महिलाओं का पहुंचना अपने देश में अब भी कई मायनों से कठिन है. पारिवारिक, समाजिक दवाब को परे कर इस आस में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों तक महिलाएं पहुंचती हैं, कि अब शायद कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा. पर यदि इन स्वास्थ्य केंद्रों पर ही महिलाओं के साथ जानवरों की तरह व्यवहार किया जाए, तो जनसंख्या नियंत्रण के लिए किए गए  कागजों पर की गई तमाम सरकारी कवायद धरातल पर फेल होती नजर आती है. ऐसा ही एक नजारा दिखा जिले के तिलैया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर. यहां ऑपरेशन के बाद दर्द से कराहती महिला को स्वास्थ्य केंद्र एक बेड तक मुहैया नहीं करा पाया. आलम यह है कि ऑपरेशन के बाद महिलाएं इतनी ठंड में जमीन पर लिटा दी गईं. इतना ही नहीं, अनाप-शनाप मसले की बात कहकर उनसे पैसे की वसूली भी की जा रही. जबकि यहां उनका मुफ्त में बंध्याकरण की व्यवस्था होनी थी.  

    यह है मामला

     जनसंख्या नियंत्रण के सापेक्ष में जिले में मातृत्व बंध्याकरण कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इसके तहत एके रेफरल अस्पताल, सदर अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में महिलाओं के नि:शुल्क बंध्याकरण की व्यवस्था है. कार्यक्रम के तहत हर सप्ताह 20 से 25 महिलाओं का ऑपरेशन किया जाना है.  इसी के तहत तिलैया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में महिला बंध्याकरण कार्यक्रम चल रहा था जिसमें कुल 25 महिलाओं का बंधय्करण किया गया. इस कार्यक्रम में आई महिलाओं से खून जांच के नाम पर प्रति महिला 300 रुपए लिए गए. वहीं 100 रुपए साहब के पान-पुड़िया के लिए लगता है, बोल कर लिया गया है. डोमचांच के मधुबन से आयी संगीता देवी बताती है कि हम यहां पर बंध्याकरण करवाने आए हैं, जहां पर स्वास्थ्य केंद्र कर्मी द्वारा 400 रुपया लिया गया. वहीं सुविधा के नाम पर स्वास्थ्य केंद्र में कुछ भी नहीं है. किसी भी महिला को कोई दवाई नहीं दी जा रही है और ना ही उसे अन्य कोई सुविधा दी जा रही है. ऑपरेशन करने के बाद महिलाओं को जानवर की तरह जमीन में लिटा दिया जा रहा है. जहां महिलाएं दर्द से कराह रही हैं. इस मामले पर अधिक जानकारी के लिए जब वहां के स्वास्थ्यकर्मी से बात की गई तो अपना नाम नहीं छापने के शर्त पर उन्होंने बताया कि महिलाओं से सफाई और धुलाई के नाम पर 100 रुपए, दवाई देने के नाम पर 300 रुपए और अगर अन्य कोई सुविधा चाहिए तो उसके लिए अलग से पैसे लिए जाते हैं.

    कौन लेगा इस लापरवाही की जिम्मेदारी

    अब सवाल ये है कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य कर्मियों की इस लापरवाही से एक भी महिलाओं को किसी भी तरह की अन्य बीमारी या किसी भी विकट परिस्थिति का सामना करना पड़ गया तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? क्या इसकी जिम्मेदारी जिला प्रशासन लेगा या स्वास्थ्य केंद्र के ये कर्मी ! या वे डॉक्टर जो बिन कारण के पैसों की उगाही तो करवा रहे हैं मगर, व्यवस्था के नाम पर जिनसे कुछ नहीं हो पा रहा है.

    रिपोर्ट : संजय कुमार शर्मा, कोडरमा


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