बिहार का अगला सीएम कौन होगा? क्या कहता है गणित या फिर नीतीश कुमार  तय करेंगे अपना वारिस?

    बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज जदयू के फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाएंगे।  नामांकन वापसी की आज अंतिम तिथि सुबह 11:00 बजे तक थी.

    बिहार का अगला सीएम कौन होगा? क्या कहता है गणित या फिर नीतीश कुमार  तय करेंगे अपना वारिस?

    TNP DESK- बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज जदयू के फिर से राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाएंगे।  नामांकन वापसी की आज अंतिम तिथि सुबह 11:00 बजे तक थी.  अब सिर्फ नीतीश कुमार का नामांकन ही बचा  है, यानी चौथी बार नीतीश कुमार जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेगें।  फिर यहीं से सवाल खड़ा होता है कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? क्या नीतीश कुमार ही तय करेंगे कि  उनका वारिस कौन होगा? या भाजपा ने तय कर लिया है कि किसे  बिहार का अगला  मुख्यमंत्री बनाना है.  वैसे चिराग पासवान ने कहा है कि एनडीए में मुख्यमंत्री का नाम तय हो गया है.  जल्द ही इसकी घोषणा होगी। 

    समृद्धि यात्रा के दौरान संकेत के क्या निकले जा रहे मतलब 

     मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी समृद्धि यात्रा के दौरान कुछ संकेत भी दिए हैं.  यह  संकेत सम्राट चौधरी की ओर जाता है.  लेकिन अभी भी बिहार में मुख्यमंत्री को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है.  नीतीश कुमार को जानने - समझने वाले अभी कई तरह की शंका  कर रहे हैं.  अंतिम समय में नीतीश कुमार क्या निर्णय करेंगे, मुख्यमंत्री पद के लिए  किसकी पीठ पर हाथ रखेंगे, यह अभी कहना जल्दबाजी  होगी।  दूसरी तरफ यह भी  कहा जा रहा है कि भाजपा बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने  के लिए परेशान है.  उसे जल्दबाजी है, वह चाहती है कि बिहार में उसका मुख्यमंत्री बन जाए.  ऐसे में सवाल यह भी खड़ा होता है कि भाजपा की जो परिपाटी रही है, उसके मुताबिक वह किसी चौंकाने वाले नाम को लेकर सामने आ सकती है.  लेकिन फिर यहां नीतीश कुमार बीच में आ सकते हैं.  

    दिल्ली की राजनीति के वावजूद क्या छोड़ पाएंगे बिहार 

    इतना तो तय है कि नीतीश कुमार भले ही दिल्ली की राजनीति करेंगे, लेकिन उनका दिल बिहार में  लगा रहेगा और यही वजह है कि जिस परिवारवाद   से वह दूर रहते आए, इसी  परिवारवाद में वह भी उलझ गए हैं.  पुत्र निशांत कुमार को राजनीति में लाने के बाद यह बात भी कही जा रही है कि बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव ने जो किया, वहीं नीतीश कुमार ने भी कर दिया है.  यह  अलग बात है कि लालू प्रसाद के पुत्र तेजस्वी यादव अब स्थापित पॉलिटिशियन हो गए हैं, लेकिन नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को अभी लंबा संघर्ष करना पड़ेगा।  यह  अलग बात है कि निशांत  कुमार पिता की राह  चलने का  प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अभी भी कई सवाल खड़े हैं.  क्योंकि सामने भाजपा खड़ी है तो जदयू में भी कई "खिलाड़ी पॉलीटिशियन" काम कर रहे हैं. 

    बीस साल तक मुख्यमंत्री रहने वाले का कैसे बदल गया दिल 
     
    यह  अलग बात है कि निशांत कुमार को राजनीति में लाने की आवाज जदयू  से ही उठी थी.  सवाल यह भी किये  जा रहे हैं कि आखिर नीतीश कुमार राज्यसभा जाने का निर्णय क्यों और किन परिस्थितियों में लिया?  दिल्ली की राजनीति छोड़कर वह बिहार आए थे और 2005 के बाद लगातार बिहार के मुख्यमंत्री रहे.  लगभग दो दशक तक मुख्यमंत्री रहने के बाद अचानक उनका दिल क्यों बदल गया? नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से किसको कितना फ़ायदा होगा ? नीतीश कुमार का राज्यसभा में जाना क्या उनका खुद का निर्णय है? क्या वह भाजपा से अधिक   अपने आसपास रहने वाले लोगों की राजनीति के शिकार हो गए हैं? 2025 के चुनाव में भी कई तरह के रंग देखे गए थे.  बिहार छोड़ने का निर्णय नीतीश कुमार खुद लिया होगा , इस पर किसी को भरोसा नहीं हो रहा है.  

    नीतीश कुमार के बिहार में रहते भाजपा को क्या है खतरा 

    जानकार बताते हैं  कि  नीतीश कुमार के रहते भाजपा का कोई भी नेता बिहार में पनप नहीं सकता है.  भाजपा यह पूरी तरह से ठोक -पीट कर देख चुकी है और यही वजह है कि जदयू को कम सीट  आने के बावजूद भाजपा उनको मुख्यमंत्री बनाये रखा.  2025 के चुनाव परिणाम के बाद  भी भाजपा सीधे तौर पर नीतीश कुमार को हटाने से परहेज किया।  हो सकता है कि नीतीश कुमार को यह  समझाया गया हो कि उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक एंट्री का यही सही वक्त है.  लेकिन क्या नीतीश कुमार की तरह निशांत कुमार बिहार की राजनीति में सफल हो पाएंगे? यह बड़ा सवाल है. 

    अगर निशांत कुमार को पॉलिटिक्स में एंट्री ही दिलानी थी तो 

    यह भी सवाल है कि अगर निशांत कुमार को पॉलिटिक्स में एंट्री ही दिलानी थी तो बढ़िया होता कि उन्हें राज्यसभा भेज दिया जाता. जहां से वह राजनीति के ककहरा भी सिखते.  यह  अलग बात है कि नीतीश कुमार को दिल्ली शिफ्ट कराकर भाजपा को बिहार में राजनीति करना भी बहुत आसान नहीं होगा.क्योंकि बिहार में कोई भी विपक्षी दल हो, नीतीश कुमार की  "गुगली"  में वह फंसता  रहा है.  भाजपा भी इस बात को जानती है कि नीतीश कुमार अगर दिल्ली शिफ्ट होते हैं तो विपक्षी दल एक बार फिर जमीन पर उतरकर राजनीति करेंगे और ऐसे में तिकड़म की राजनीति नहीं चलेगी. सूत्र बताते  है कि नीतीश कुमार के "किचन कैबिनेट" की पीठ पर हाथ रखकर भाजपा ने बिहार में अपना रास्ता खोज लिया है.  भाजपा के लिए अब मुख्यमंत्री की कुर्सी बहुत दूर नहीं रह गई है लेकिन नीतीश कुमार तो राजनीति में  नीतीशे कुमार हैं. 

    रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो


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