रोटी की तलाश में विदेशों में नर्क जैसी जिंदगी गुजारने को मजबूर झारखंड के मजदूर, आखिर कैसे रुकेगा इनका पलायन!

    रोटी की तलाश में विदेशों में नर्क जैसी जिंदगी गुजारने को मजबूर झारखंड के मजदूर, आखिर कैसे रुकेगा इनका पलायन!

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : हर साल लाखों की संख्या में मजदूर रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और दूसरे बड़े शहरों समेत विदेशों में पलायन करते हैं. गरीबी और आर्थिक तंगी के कारण मजदूर मानव तस्करों के चंगुल में फंस जाते हैं. जब भी रोजगार की बात होती है तो पहली तस्वीर में झारखंड के युवा को मजदूर के तौर पर देखा जाता है. आजीविका के सिमटते साधनों के कारण झारखंड के युवा अपने गांव व शहर छोड़ने को मजबूर हैं. लाखों आदिवासी लड़के-लड़कियां अपनी भूख मिटाने के लिए राज्य से बाहर जाते हैं. गौरतलब है कि झारखंड में पलायन (Escape) और मानव तस्करी (Human trafficking) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. विकास से जुड़े कई विरोधाभासी मुद्दों में से पलायन और मानव तस्करी एक महत्वपूर्ण और गंभीर मुद्दा है.

    जानिए क्या कहते है आंकड़ें

    एक आंकड़े के अनुसार झारखंड में दलित और आदिवासी आबादी का 35 प्रतिशत हिस्सा पलायन को मजबूर है. इनमें 55 प्रतिशत महिलाएं, 30 प्रतिशत पुरुष और 15 प्रतिशत बच्चे शामिल हैं. इनमें से ज़्यादातर दिहाड़ी मज़दूर हैं और बाकी को फ़र्जी प्लेसमेंट एजेंसियों और दलालों द्वारा राज्य से बाहर ले जाया जा रहा है.

    सस्ते दर पर मजदूर उपलब्ध होने के कारण हो रहा पलायन

    नौकरी दिलाने के नाम पर महिलाओं और बच्चों को दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता जैसे महानगरों में बेचने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं. प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा झारखंड से महिलाओं और युवाओं को भी मजदूर के रूप में विदेशों में भेजा जा रहा है. यहां तक की उनका शारीरिक और मानसिक शोषण भी किया जाता है.

    सस्ते दर पर मजदूर उपलब्ध होने के कारण खाड़ी देशों में कामगारों का पलायन लगातार हो रहा है. देश के अंदर भी सबसे ज्यादा पलायन झारखंड से ही हो रहा है. जामताड़ा जिले के विभिन्न प्रखंड क्षेत्रों से बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल आदि राज्यों में काम की तलाश में कामगारों के समूह को जाते देखा जा सकता है.

    गौरतलब है कि जल, जंगल और जमीन के लिए लंबे संघर्ष के बाद आदिवासी बहुल राज्य झारखंड 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग हुआ था. इसका फायदा यह हुआ कि पिछले 24 सालों में इस राज्य की कमान पांच बार आदिवासी नेताओं के हाथ में रही. 28 एसटी विधानसभा सीटों के बावजूद इस राज्य में रहने वाले आदिवासी गरीबी में जी रहे हैं और पलायन करने को मजबूर हैं.

    मानव तस्करी का मुख्य कारण शिक्षा व रोजगार का विकास न होना

    राज्य में मानव तस्करी का मुख्य कारण शिक्षा और रोजगार क्षेत्र का समुचित विकास न होना है. वर्तमान में 12वीं के बाद बच्चों को टेक्नोलॉजी, मेडिकल और अन्य शिक्षा के लिए बेंगलुरु, चेन्नई, भुवनेश्वर जाना पड़ता है. शिक्षा के बाद अपने राज्य में रोजगार न मिलने के कारण बच्चे अपनी प्रतिभा से दूसरे राज्यों को लाभान्वित कर रहे हैं. शिक्षा के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे और उद्योग के विकास न होने से गरीबी बढ़ी है. जंगलों की अंधाधुंध कटाई ने भी इस समस्या को जन्म दिया है. आमतौर पर फसलों की बुआई के बाद मजदूरों का पलायन होता था, लेकिन पिछले कुछ सालों से सूखे के डर ने उन्हें पहले ही अपने गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया है.

    मनरेगा और अन्य योजनाएं कारगर नहीं

    मानव तस्करी राज्य को दीमक की तरह खोखला कर रही है. सबसे हैरानी की बात यह है कि सरकार और प्रशासन को लगता है कि सिर्फ कानून बना देने से सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी. लेकिन ऐसी समस्याओं का समाधान सिर्फ कानून बना देने से नहीं हो सकता. मजदूरों को रोजगार और सामाजिक सुरक्षा देने के लिए बनाई गई मनरेगा या इससे जुड़ी दूसरी योजनाएं बहुत कारगर साबित नहीं हो रही हैं.

    केंद्र और राज्य सरकारें पलायन और मानव तस्करी रोकने के लिए कई योजनाएं चला रही हैं, लेकिन योजनाएं धरातल पर लागू नहीं हो पाई हैं. सच तो यह है कि इन समस्याओं की जड़ में गरीबी है. अगर सरकार काम नहीं देगी तो राज्य में मानव तस्करी और पलायन जैसी समस्याएं बनी रहेंगी. ऐसा नहीं है कि सरकार के पास विकास के लिए संसाधनों की कमी है, जरूरत सिर्फ इसे सही तरीके से लागू करने की है.


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