‘ठाकुर विवाद’ के बीच आनन्द मोहन की दो टूक, अपने अंदर के ब्राह्मणत्व को खत्म करे मनोज झा, ब्राह्मणों ने खड़ी की नफरत की दीवार

    ‘ठाकुर विवाद’ के बीच आनन्द मोहन की दो टूक, अपने अंदर के ब्राह्मणत्व को खत्म करे मनोज झा, ब्राह्मणों ने खड़ी की नफरत की दीवार

    पटना(PATNA): ‘ठाकुर विवाद’ में भले ही राजद सुप्रीमो लालू यादव के द्वारा आनन्द मोहन को कम अक्ल के तमगे से विभुषित कर दिया गया हो, भले ही राबड़ी दरबार में उनके लिए नो इंट्री की बोर्ड लग गयी हो, भले ही राजद सुप्रीमो चेतन्य आनन्द से मिलने से इंकार कर इस बात को रेखांकित कर दिया हो कि राजद की राजनीति क्या होने वाली है. और इस राजनीति में उनकी क्या हैसियत रहने वाली है.

    बावजूद इसके आनन्द मोहन का तापमान कम होता दिख नहीं रहा है. वह आज भी मनोज झा को निशाने पर लेने से पीछे हटते नहीं दिख रहे हैं, उल्टे वह लालू यादव को ही इस बात की नसीहत देते नजर आ रहे हैं कि मनोज झा जैसे लोग महज बहती धारा के साथी है, जैसे ही आप पर संकट मंडरायेगा, वह इस सियासी कश्ती को सलाम करने में देरी नहीं करेंगे, आनन्द मोहन तो इस बात की भविष्यवाणी भी कर रहे हैं कि मनोज झा का भाजपा के साथ गुप्त समझौता है, और वह भाजपा के ही इशारों पर महागठबंधन की इस एकता में फिटकरी डालने का काम कर रहे हैं.

    अब अपने ताजा बयान में आनन्द मोहन ने मनोज झा को अपने अन्दर का ब्राह्मण्त्व को समाप्त करने की चुनौती पेश किया है, उन्होंने कहा कि बुद्ध से लेकर वीपी सिंह ने दलित पिछड़ी जातियों के लिए समानता का राह खोला, उनके लिए समान दर्जे की वकालत की,  उंच नीच की बेड़ियों को तोड़ कर मानव के रुप में सम्मानपूर्ण जिंदगी का हक दिया, लेकिन सवाल यह है कि दलित पिछड़ों की जिंदगी में यह जहर किसने घोला, उनको दोयम दर्जे का नागरिक किसने घोषित किया, किसने उन सिन्द्धातों की रचना की और उसे ईश्वरीय आदेश बताया, जहां दलितों को मंदिर में प्रवेश तक की मनाही कर दी गयी, और तो और इस धूर्तता को धर्म का नाम दिया गया.

    आनन्द मोहन ने इस बात का दावा किया कि उनके पूर्वजों ने राष्ट्रपिता बापू के आदेश पर दलित के लिए मंदिर प्रवेश का आन्दोलन चलाया, उनके लिए बराबरी की वकालत की, और इसकी शुरुआत एक चंडाल के हाथ से पानी पीकर किया. जिसके बदले में उनके पूरे परिवार का सामाजिक बहिष्कार किया गया, आखिर हमारे परिवार का सामाजिक बहिष्कार और दलितों पर लगायी सामाजिक बेड़ियां आयत करने का जिम्मेवार कौन था, ठाकरों को निशाने पर लेने के पहले मनोज झा को इन सवालों का जवाब देना चाहिए.

    आनन्द मोहन ने मनोज झा के साथ ही इस विवाद में उनके पिता को लपेट लिया, उन्होंने कहा कि मनोज झा की तरह उनके पिता भी कभी पक्के समाजवादी का चोंगा पहन कर घूमा करते थें, लेकिन जैसे ही मंत्री पद का ऑफर मिला, समाजवादी चोंगों को उतार कर तुरंत मंत्री पद की शपथ ले बैठें, इस हालत में राजद को मनोज झा जैसे नेताओं से बेहद सावधान रहने की जरुरत है.

    घ्यान रहे कि इस विवाद में अब जदयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने आरएसएस की भी इंट्री करवा दी है. उन्होंने कहा है कि सौ वर्षों के इतिहास में जिस आरएसएस के द्वारा एक दलित को सरसंघचालक नहीं बनाया गया, उनके लोगों के द्वारा एक मनोज झा की समता समानता और भाईचारे की वैचारिकी पर सवाल खड़ा किया जा रहा है. उन्हे जान से मारने की धमकी दी जा रही है, जीभ खींचने का फरमान जारी किया जा रहा है.

    ठाकुर नहीं लड़ाई ठाकुरत्व से

    नीरज कुमार ने मनोज झा के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि यहां सवाल ठाकुर का नहीं है, ठाकुरत्व है, उस प्रवृति का है, जो दमनकारी है, मनोज झा ने खुद अपने अंदर के ठाकुरत्व को भी मिटाने की बात कही है, बात जब अंदर के ठाकुर की हो रही है, तब इसे बाहर वाले ठाकुर से जोड़ने की साजिश क्यों की जा रही है. क्या यह सत्य नहीं है सौ वर्षों के इतिहास में आरएसएस ने एक भी दलित को अपना सरसंघचालक नहीं बनाया. जब तक समाज की यह स्थिति रहेगी तब तक ‘ठाकुर का कुंआ’ की प्रांसगिकता बनी रहेगी. और इसको लेकर सवाल खड़े किये जाते रहेंगे.


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