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जहां टूट जाता है मोदी मैजिक का दम! हेमंत के उस "कोल्हान" में बाबूलाल खिलाने चले कमल

BY -
Devendra Kumar CW
Devendra Kumar CW
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 2:20:00 PM

TNP DESK-जबसे प्रदेश अध्यक्ष के रुप में बाबूलाल की ताजपोशी हुई है, वह एक साथ कई मोर्चे पर संघर्ष करते नजर आ रहे हैं. एक तरफ उनकी चुनौती पार्टी के पुराने धुरंधर, लेकिन जनाधार विहीन नेताओं में अपनी स्वीकार्यता स्थापित करने की है, जो आज भी बाबूलाल को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष के रुप में हजम करने को तैयार नहीं है, जिसे लगता है कि आलाकमान ने बाबूलाल को सिर पर बैठा कर उनके हिस्से की मलाई खिला रहा है, हालांकि पार्टी का यह खेमा बाबूलाल पर आलाकमान की नजरे इनयात को देख कर विरोध की स्थिति में भी नहीं है, लेकिन इसके साथ ही वह बाबूलाल के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने से पहरेज करता भी नजर आता है. और यही कारण है कि अपनी ताजपोशी के करीबन छह माह गुजर जाने के बाद भी बाबूलाल अपनी कमिटी का गठन करने का जोखिम भी नहीं उठा पा रहे हैं, संकट यह है कि इसमें किस चेहरे को सामने लाया जाय और किसे नेपथ्य का रास्ता दिखलाया जाय, क्योंकि इसमें हर चेहरा किसी ना किसी जुगाड़ के साथ दिल्ली दरबार से जुड़ा है.

हेमंत के आधार मतों सेंधमारी की चुनौती

इसके साथ ही बाबूलाल ने झामुमो का कोर वोट बैंक आदिवासी मतों में सेंधमारी करने का दूसरा मोर्चा भी खोल रहा है. लेकिन यह दूसरा मोर्चा भी इतना आसान नहीं है, क्योंकि जिस तरह रघुवर दास को आगे कर भाजपा ने झारखंड की सियासत में मास्टर स्ट्रोक का दावा किया था, उसके बाद आदिवासी मतदाताओं को यह विश्वास दिलाना टेढ़ी खीर है कि अब इस तरह के प्रयोग दुहरायेंगे नहीं जायेंगे. और उधर हेमंत सोरेन लगातार 1932, सरना धर्म कोड, पिछड़ों का आरक्षण विस्तार का कार्ड खेल कर भाजपा पर आदिवासी-मूलवासी विरोधी होने का तमगा लगाने पर अड़े हैं. हालांकि हकीकत यह भी है कि जिस 1932 का खतियान और डोमिसाइल के नारे के साथ आज हेमंत सोरेन आदिवासी-मूलवासी मतों का ध्रुवीकरण की जमीन तैयार कर रहे हैं, उसका मास्टर माइंड और कोई नहीं खुद बाबूलाल ही थें. यह अलग बात है कि तब भाजपा को बाबूलाल का यह राग पसंद नहीं आया और आज भी भाजपा को आदिवासी-मूलवासी जैसी शब्दावलियां और 1932 का खतियान, सरना धर्म कोड जैसे मुद्दों से अघोषित परहेज हैं. वह एक हद तक इन मुद्दों से दूरी बनानी की रणनीति पर ही काम करता है. दरअसल भाजपा की मुश्किल यह है कि वह अपने कोर वोटरों के कीमत पर इस मुद्दे के साथ जाना नहीं चाहता, शहरी मतदाता, प्रवासी और तथाकथित रुप से सवर्ण जातियां ही उसका सबसे मजबूत आधार वोट बैंक है, बाबूलाल की चुनौती भाजपा के इस आधार वोट बैंक को अपने साथ रख कर आदिवासी-मूलवासियों में सेंधमारी की है.

कभी भाजपा का यही कोर वोटर बाबूलाल के पुतले जला रहा था

ध्यान रहे कि कभी भाजपा का यही आधार वोट कभी बाबूलाल के डोमिसाइल के विरोध में सड़कों पर उपद्रव कर रहा था और इसकी अंतिम परिणति बाबूलाल की सत्ता से विदाई के रुप में हुई थी, अब बदले हालात में बाबूलाल को इसी आधार वोट को अटूट बनाये रख कर हेमंत के कोट वोटरों में सेंधमारी करने की है, यही बाबूलाल का मिशन है और भाजपा में उनकी पुनर्वापसी करवाने के पीछे यही आलाकमान की मंशा भी है, और बाबूलाल लगातार इसी मिशन को कामयाब बनाने की मुहिम चला रहे हैं, हालांकि एक संगठन के बतौर देखे तो बाबूलाल को इस मोर्चे पर भी संगठन से वह सहयोग नहीं मिल रहा, जो एक प्रदेश अध्यक्ष के रुप में मिलना चाहिए था. लेकिन इन तमाम झंझवातों के बावजूद बाबूलाल ने हिम्मत नहीं हारी है.

कोल्हान में कमल खिलाने की जिद्द

इसका सबसे बड़ा प्रमाण कोल्हान में कमल खिलाने की जिद्द का है. यह वही कोल्हान है, जहां 2019 के विधान सभा चुनाव में 14 में से 13 सीटों पर झामुमो और कांग्रेस ने अपना परचम लहराया था, जबकि 14वीं सीट पर सरयू राय ने तात्कालीन सीएम रघुवर दास को पटकनी देकर झारखंड की सियासत में भूचाल ला दिया था. ध्यान रहे कि चुनाव के पहले पहले तक सरयू राय रघुवर सरकार में काबिना मंत्री थें, लेकिन इस दरम्यान भी दोनों के बीच एक दूसरे पर तलवार खिंची हुई थी. रघुवर दास ने दिल्ली दरबार में अपनी पकड़ का इस्तेमाल करते हुए सरयू राय को बेटिकट करने की रणनीति अपनायी तो सरयू राय ने पूर्वी जमशेदपुर की सीट से रघुवर दास के विरुद्द ही बतौर निर्दलीय मैदान में उतरने का एलान कर दिया. और इसका अंतिम परिणाम यह हुआ कि  रघुवर पूर्व सीएम शिबू के साथ उस सूची में शामिल हो गयें, जिनके नाम सीएम रहते अपने ही सीट से विधान सभा का चुनाव हारने का रिकार्ड था.

किस विधान सभा से किसने मारी थी बाजी

यहां बता दें तब जमशेदपुर पूर्वी से सरयू राय, जमशेदपुर पश्चिमी- बन्ना गुप्ता,बहरागोड़ा- समीर मंहती, पोटका संजीव सरादार, जुगसलाई मंगल कालिंदी,घाटशिला रामदास सारेन,सरायकेला चंपई सोरेन, खरसावा-दशरथ गागराई, ईचागढ़ सविता महतो, चाईबासा दीपक बिरुवा,जगन्नाथपुर सोनाराम सिंकु,चक्रधरपुर सुखराम उरांव, मझगांव निरल पुरती और मनोहरपुर से जोबा मांझी ने परचम लहराया था. साफ है कि इन चौदह सीटों में एक भी फूल नहीं खिला, बाबूलाल की नजर झामुमो के इसी किले पर कमल खिलाने की है, और यही कारण है कि शायद पूरे झाऱखंड के शुरुर में डूबा है. बाबूलाल भाजपा के सभी प्रदेश अधिकारियों के साथ कोल्हान में डेरा डाले हुए हैं. एक तरफ जहां भाजपा अनुसूचित जनजाति की मोर्चा के पदाधिकारियों की बैठक जारी है, दूसरी तरफ बाबूलाल अपने तमाम पदाधिकारियों के साथ उसी चाईबासा में दो दिनों का मैराथन बैठक कर कोल्हान के इस किले को ध्वस्त करने का सियासी चाल ढूढ़ रहे हैं.

कोल्हान में आदिवासी मूलवासी पहचान एक बड़ा मुद्दा

लेकिन मुश्किल यह है कि कोल्हान की अधिंकाश सीटें अनुसूचित जन जाति के लिए आरक्षित हैं और इनके लिए खतियान आधारित आरक्षण के साथ ही आदिवासी-मूलवासी पहचान एक बड़ा  मुद्दा है. हेमंत सोरेन की शक्ल में उसे अपना सामाजिक प्रतिनिधित्व नजर आता है, हेमंत के नारों में वह अपने मुद्दों की अनुगूंज सुनता है, उसे वहां जल जंगल जमीन की आवाज नजर आती है, विस्थापन और संघर्ष नजर आता है,इसके विपरीत भाजपा बांग्लादेशी मुसलमान, हिन्दूत्व, राम मंदिर को उछाल कर सामाजिक ध्रुवीकरण को तेज कर राह बनाने की जुगत लगाता दिखता है, हालांकि यहां यह भी याद रहे कि भले ही अधिकांश सीटें अनुसूचित जनजाति आरक्षित हो, लेकिन तमाम विधान सभाओं पर एक बड़ी महत्वपूर्ण आबादी कुर्मी-महतो आबादी की भी है, और ये कुर्मी मतदाता हार जीत का फैसला तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं. पिछले दिनों भाजपा ने शैलेन्द्र महतो के साथ ही कई कुर्मी चेहरों को अपने साथ खड़ा किया है, दावा तो यह भी किया जाता है कि गीता कोड़ा जो कांग्रेस कोटे से वर्तमान सांसद है, वह भी कलम की सवारी कर सकती है, इस हालत में यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी लोकसभा और विधान सभा चुनावों में बाबूलाल की मेहनत कितनी रंग लाती है, या तमाम सियासी चाल और ध्रुवीकरण की कोशिश के बावजूद हेमंत अपना हिम्मत दिखला जाता है.  

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