पटना से रांची तक पसरता सियासी धुंध! वंदना की विदाई स्वाभाविक फैसला या बदले घटनाक्रम में एक पॉलिटिकल मैसेज देने की कोशिश

    पटना से रांची तक पसरता सियासी धुंध! वंदना की विदाई स्वाभाविक फैसला या बदले घटनाक्रम में एक पॉलिटिकल मैसेज देने की कोशिश

    Ranchi-गुरुवार की देर शाम वंदना डाडेल को मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव के पद से विमुक्त कर मंत्रिमंडल सचिवालय एवं निगरानी विभाग के प्रधान सचिव पर नियुक्ती की अधिसूचना जारी कर दी गयी और इसके साथ ही राजधानी रांची के सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया. इस अधिसूचना को अलग-अलग चस्में से देखने की कोशिश की जाने लगी. दावा किया जाने लगा कि वंदना डाडेल की विदाई ईडी को लिखे उनके पत्र का नतीजा है.

    क्या ईडी को पत्र भेजने का फैसला वंदना डाडेल का स्वत: स्फूर्त फैसला था

    लेकिन यहां बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या वंदना डाडेल यह सब कुछ स्वत: स्फूर्त कर रही थी, क्या यह सब कुछ उनका व्यक्तिगत निर्णय था, और सरकार के स्तर यानी सीएम और उनके सहयोगियों के स्तर पर इसकी कोई चर्चा नहीं हुई थी. क्या बगैर सीएम की जानकारी और उनका मार्ग दर्शन प्राप्त किये ईडी जैसी संस्था को पत्र लिखा जा रहा था. और क्या पत्र को लिखे जाने के पहले इसके संभावित परिणाम पर कोई चर्चा नहीं हुई थी, इस पत्र के जवाब में ईडी की क्या प्रतिक्रिया आयेगी, उसका आकलन नहीं किया गया था. और यदि ऐसा ही है तो निश्चित रुप से इसके गंभीर निहितार्थ है.

    वंदना की विदाई एक सियासी मैसेज देने की कोशिश तो नहीं

    लेकिन इसके साथ ही इस बात के कयास भी जारी है कि कहीं ना कहीं वंदना की विदाई के अपने सियासी मैसेज है, यह राज्य में बदलते सियासी माहौल की ओर एक इशारा है, दावा यह भी है कि इसी बदलते सियासी माहौल में वंदना को बलि देने की पटकथा लिखी गयी. क्योंकि वंदना जो भी कर रही थी, वह बिल्कुल सीएम के गुडफेथ में कर रही थी और आज भी सीएम हेमंत का वंदना के प्रति कोई नाराजगी नहीं है, उनके कामों लेकर कोई शिकायत नहीं है, दरअसल सरकार वंदना की विदाई कर राज्य सरकार केन्द्र सराकर को एक इशारा देने की कोशिश कर रही है कि यदि हम एक कदम आगे बढ़ने को तैयार है, तो केन्द्र सरकार भी एक कदम अपना भी आगे बढ़ायें, और जिस ईडी के खेल में वह हमारी सरकार को फंसाना चाहती है, अपने उस ‘दुलारे घोड़े’ पर लगाम लगायें. लेकिन क्या वाकई इस संकेत के बाद झारखंड में ईडी के इस कहर पर विराम लगने वाला है, क्या वाकई हेमंत सोरेन और भाजपा में किसी स्तर पर दिल्ली में कोई संवाद जारी है, क्या वाकई उसी संवाद का नतीजा वंदना की विदाई है, इसका अभी तक कोई पुख्ता आधार नहीं है, यह सब कुछ महज सियासी गलियारों का गोसिप है.

    लेकिन हर गोसिप का एक आधार भी होता है

    लेकिन यह गोसिप सिर्फ हवा में नहीं है, दरअसल जिस तरह पटना से लेकर रांची तक एक प्रकार का सियासी धुंध फैलता दिखता रहा है, यह गोसिप उसी कड़ियों को आपस में जोड़ कर तैयार किया जा रहा है, यहां बता दें कि पटना में यह चर्चा तेज है कि जदयू की ओर से अपने सारे विधायकों और विधान पार्षदों को 23,24,25 जनवरी के बीच पटना में बने रहने का निर्देश दिया गया है, जिसके बाद पटना की सियासत में अंदर खाने काफी बेचैनी पसरी है, क्योंकि जब जब भी सीएम नीतीश ने पाला बदला है, अपने सारे विधायकों और पार्षदों को पटना में जमे रहने का निर्देश दिया है, चाहे वह पाला बदल भाजपा छोड़ राजद के साथ आने का हो, या  कुछ ही महीनों के बाद एक फिर से राजद को गच्चा देकर भाजपा के साथ जाने का हो, या फिर एक बार भाजपा को झटका देकर राजद के साथ सियासी चूड़ा दही खाने का हो, हर पलटी के पहले सीएम नीतीश ने अपने विधायकों को पटना में जमे रहने का निर्देश दिया है, और इस निर्दश के बाद हर बार सीएम नीतीश चुप्पी साध कमरे में बंद हो जाते हैं, मीडिया से उनकी दूरी बन जाती है, इस बार भी कुछ संकेत इसी दिशा में जा रहे हैं.

    चिराग पासवान, जीतन राम मांझी से लेकर उपेन्द्र कुशवाहा तक में सियासी बेचैनी

    इसी बेचैनी का नतीजा है कि चिराग पासवान, जीतन राम मांझी से लेकर उपेन्द्र कुशवाहा तक दिल्ली की दौड़ लगा रहे हैं, इन लोगों की  बंद कमरे में वार्ताओं का लम्बा दौर शुरु हो चुका है, नीतीश की एक और पलटी से इनके राजनीतिक भविष्य पर जो धुंध छाने वाला है, उसके आकलन किया जा रहे हैं, अंदर खाने भाजपा से इस बाबत सफाई मांगी जा रही है, और इसके साथ ही नीतीश की इंट्री के बाद एनडीए खेमा में उनका भविष्य क्या होगा, इसका सवाल दागा जा रहा है.

    तो क्या पटना के साथ ही रांची में भी तैयार हो रही है एक पटकथा

    तो क्या यह माना जाय कि पटना की इस बदलती सियासत का असर रांची में भी देखने को मिलने वाला है, क्या यहां भी ‘पाला बदल’ के बादल तैरने वाले हैं, या उसकी झारखंड की राजनीति उसी दिशा में बढ़ती दिखलायी पड़ रही है, और वंदना डाडेल की विदाई उसी बदलती राजनीति की ओर एक गंभीर संकेत हैं. फिलहाल इसका जवाब तो किसी के पास नहीं है, यह तमाम संभावनाएं है, जिसकी ओर हर जागरुक नागरिक को अपनी नजर टिकाए रखना चाहिए, क्योंकि राजनीति में कोई अछूत नहीं होता, और कोई भी लकीर अंतिम नहीं होती, बदलते हालात में नये फैसले लिये जाते हैं, या उसकी संभावना बरकरार रहती है, देखना होगा कि यह सारी संभवानाओं पर आने दिनों में कैसे विराम लगता है?

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