Jharkhand Politics:भाजपा के अंदर चल रहे "टग ऑफ वार" के बीच प्रदीप वर्मा को मिला राज्य सभा पहुंचने का रास्ता, लेकिन आदिवासी चेहरा को किनारा करने पर उठा सवाल

    Jharkhand Politics:भाजपा के अंदर चल रहे "टग ऑफ वार" के बीच प्रदीप वर्मा को मिला राज्य सभा पहुंचने का रास्ता, लेकिन आदिवासी चेहरा को किनारा करने पर उठा सवाल

    TNPDESK-क्या झारखंड की सियासत में लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा के अंदर के शक्ति संतुलन में कोई बड़ा बदलाव आने वाला है? क्या लोकसभा प्रत्याशियों के चयन में बाबूलाल की पसंद पर दिल्ली दरबार की मुहर के बाद भाजपा के अंदर ही सवाल खड़े होने लगे हैं? और क्या प्रत्याशियों के एलान के बाद झारखंड भाजपा का एक खेमा दिल्ली दरबार को इसके संभावित नुकसान को लेकर अगाह कर रहा है. दरअसल दिल्ली के सियासी गलियारे में इस बात की चर्चा तेज है कि लोकसभा प्रत्याशियों के चयन में जिस तरीके से बाबूलाल की पसंद को तवज्जो दी गयी. उनके द्वारा प्रस्तावित नामों पर मुहर लगायी गयी. उसके कारण पार्टी को लोकसभा चुनाव में हजारीबाग, राजमहल और पलामू सीट पर नुकसान झेलना पड़ सकता है.
    दिल्ली में रघुवर दास की सक्रियता के मायने

    खबर है कि पूर्व सीएम रघुवर दास की सक्रियता इन दिनों में दिल्ली में बढ़ी हुई है और वह भारतीय जनता पार्टी में इलेक्शन डाटा मैनेजमेंट की जिम्मेवारी संभाल रहे पंकज तिवारी के सम्पर्क में हैं. यह पंकज तिवारी ही है जिनके द्वारा झारखंड के सामाजिक समीकरणों का पूरा डाटा तैयार किया जाता है, किस सीट का जातीय गणित क्या है, किस सामाजिक समूह का सियासी वर्चस्व है और वह कौन से चेहरें हैं, जिसके बूते उस सामाजिक समीकरण को भाजपा के पक्ष में मोड़ा जा सकता है. इसका सारा गणित पंकज तिवारी ही तैयार करते हैं. यहां यह भी बता दें कि पंकज तिवारी झारखंड के गढ़वा जिले के रहने वाले हैं. इस नाते उनका रघुवर दास से पुराना संबंध है. खबर यह भी है कि झारखंड में हुए प्रत्याशियों के चयन से रघुवर दास खुश नहीं है. रघुवर दास की नाराजगी सिर्फ लोकसभा प्रत्याशियों के चयन को लेकर ही नहीं है, दावा है कि जिस तरीके से प्रदीप वर्मा को राज्य सभा भेजने का निर्णय लिया गया, रघुवर दास उसको भी झारखंड की भावी सियासत के लिए ठीक नहीं मान रहे हैं. और यही कारण है कि रघुवर दास पार्टी आलाकमान को इस संभावित नुकसान से अगाह करने की कोशिश कर रहे हैं.

    राज्यसभा से आदिवासी चेहरों को किनारा  

    बताया जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी का एक खेमा समीर उरांव से खाली हुई सीट पर किसी आदिवासी चेहरे को ही भेजने की वकालत रही थी. लेकिन आखिरकार उस खेमे की नहीं चली और आदित्य साहू के बाद एक दूसरा वैश्य चेहरा प्रदीप वर्मा को राज्य सभा भेजे जाने का निर्णय ले लिया गया. लेकिन इसके कारण झारखंड के आदिवासी नेताओं के बीच नाराजगी की खबर सामने आने लगी. यहां यह भी बता दें कि पहले इस सीट से अनुशंसित उरांव, आशा लकड़ा और अरुण उरांव को भेजे जाने की चर्चा थी. लेकिन आखिरकार यह बाजी प्रदीप वर्मा के हाथ लगी. इस हालत में सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज होने लगी है कि क्या लोकसभा चुनाव और या उसके बाद बाबूलाल को किनारा करने की कवायद शुरु हो चुकी है, जैसा की भाजपा सूत्रों का आकलन है कि इस बार झारखंड में भाजपा को अपने 2019 के रिकार्ड को दुहराना मुश्किल है, पार्टी को कई सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है, तो लोकसभा चुनाव के बाद इसकी गाज बाबूलाल पर गिरने वाली है. फिलहाल इसके लिए इंतजार करना होगा, लेकिन इतना साफ है कि झारखंड भाजपा के अंदर टग ऑफ वार की स्थिति बन चुकी है. और इसके निशाने पर बाबूलाल है, यदि पार्टी ने 2019 का परफोर्मेंस दुहरा दिया तो बाबूलाल की बल्ले बल्ले लेकिन यदि पार्टी को शिकस्त मिली तो बाबूलाल के सियासी पर कतरे जा सकते हैं. और इसका सीधा लाभ रघुवर दास को मिलेगा.

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