मार्च में ही रांची में चिलचलाती गर्मी, आसमान बरसा रहा आग ! आखिर झारखंड के “शिमला” पर किसकी लगी नज़र 

    मार्च में ही रांची में चिलचलाती गर्मी, आसमान बरसा रहा आग ! आखिर झारखंड के “शिमला” पर किसकी लगी नज़र 

    रांची: एक समय था जब रांची में लोग चैत के महिने में कंबल ओढ़ कर सोते थे .लेकिन आज झारखंड की राजधानी की तस्वीर कुछ ओर ही कह रही है. भला पिछले साल की झुलसाती गर्मी को कौन भूल सकता है ? जब इंसान तिखी धूप और गरम हवा के थपेड़ों के चलते बेहाल हो गया था. तन-बदन पसीने से भीग गया था. ऐसा ही कुछ हाल इस साल मार्च के महीने में दिख रहा है. अभी गर्मी की पूरी आमद नहीं हुई है, बावजूद अभी से ही लोगों का हाल बेहाल हो या है. सोचिए आखिर मई जून में गर्मी का आलम क्या होगा . रांची को झारखंड का शिमला भी बोला जाता था. लेकिन, आज इसे नजर लग गयी है . इस शहर को विकास के नाम पर बड़ें बड़ें बिल्डिंगे, सडकें और फ्लाई ऑवर बनाई जा रही है. जिस कारण अंधा धुंध  पेडों की कटाई  एवं जगलों को नष्ट कर ऱांची के मौसम के साथ खिलवाड़ कर रहें है.आख़िरकार क्या कारण हैं की लोग गर्मी से बेहाल हों गए हैं ..

    शहरीकरण से बिगड़ रहे हैं हालात

    रांची शहर के आसपास पहाड़ों की कटाई से उभरे चट्टानों के चलते भी  गर्म हवा ऊपर उठ रही है. यही नहीं, बढ़ते शहरीकरण की वजह से यहां की मिट्टी या तो दब गई है या तो ठोस हो गई है . इसके चलते सारी गर्मी को वापस वातावरण में लौटाकर गर्मी को बढ़ा रही है. ये सभी कारण राजधानी के मौसम में आए बदलाव के बन रहे हैं. 

    बड़ी -बड़ी बिल्डिंग और घटती पेड़ो ने बढ़ाई परेशानी

    रांची शहर की अपनी जलवायु है, जो यहां की ऊंची इमारतों की वजह से प्रभावित हो रही है. गर्म हवाएं इनमें फंसकर ऊपर उठकर बादलों को धकेल देती हैं. दूसरी ओर ये इमारतें गर्म हवाओं को रोक कर शहर को धीरे-धीरे गर्म करती हैं. अगर पेड़ होती तो शायद बादल संघनित होकर बरसते और गर्मी उतनी महसूस नहीं होती. आज भी रांची जिले के जिन हिस्सों में जंगल हैं है वहां गर्मी का प्रकोप कम है! 

    रांची शहर में बढ़ रही गर्मी 

    आपको बता दे की मेन रोड, अपर बाजार रातू रोड, सर्कुलर रोड, पिस्का रोड, कोकर, डोरंडा एवं रांची के अगल बगल इलाके ज्यादा गर्म हो रहे हैं. इन जगहों पर ऊंची इमारतों का होना एवं पेड़ो का कम होना मुख्य वजह है. जब तक शहर में वनो को नष्ट नहीं किया गया था एवं ऊंची इमारतें कम थीं, तब तक यहां के लोग हीट से परेशान नहीं थे. 
    दरअसल, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. इस बढ़ती हुई गर्मी से सतही जल भी सूख गया है. बादल बनने की प्रक्रिया धीमी हो गई है. पूर्व में जब तक सतही जल कुछ मात्रा में उपलब्ध था, तब तक मार्च अप्रैल में वर्षा हुई, लेकिन अब जो भी बादल बन रहे हैं वो कमजोर हैं.

    रिपोर्ट- महक मिश्रा 


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