मोदी-अमित शाह का मास्ट्रर स्ट्रोक मटियामेट! देखिये कैसे झारखंड भाजपा का भार बनते जा रहे थे रघुवर दास

    मोदी-अमित शाह का मास्ट्रर स्ट्रोक मटियामेट! देखिये कैसे झारखंड भाजपा का भार बनते जा रहे थे रघुवर दास

    Ranchi- झारखंड के पहले गैर आदिवासी मुख्यमंत्री के रुप में रघुवर दास की ताजपोशी करते वक्त अधोषित रुप से भाजपा ने अपने इस कदम को झारखंड की सियासत का मास्टर कार्ड माना था, उसे इस बात का यकीन था कि झारखंड की दूसरी सभी ओबीसी जातियां रघुवर दास के नेतृत्व को सहज रुप से स्वीकार कर लेगी. और इस प्रकार इस राज्य की एक बड़ी आबादी जो गैर आदिवासियों की है, उसे अपना एक नेता मिल जायेगा, और इसके साथ ही झारखंड की सियासत में किसी ना किसी आदिवासी को सीएम बनाने की जो अधोषित परंपरा और सियासी प्रचलन रहा है, उससे मुक्ति भी मिल जायेगी.

    साफ है कि भाजपा का यह कथित मास्टर कार्ड और किसी का नहीं खुद पीएम मोदी और अमित शाह की रणनीति का हिस्सा था. हालांकि इसके पीछे एक विशेष सामाजिक समीकरण भी थें, नहीं तो उस वक्त भी भाजपा में चेहरों की कोई कमी नहीं थी, और तो और ओबीसी जातियों में ही महतो समुदाय से आने वाले चेहरों पर भी दांव लगाया जा सकता था, लेकिन मुसीबत यह थी कि कुर्मी-महतो चेहरे उस सामाजिक समीकरण में फीट नहीं बैठे पा रहे थें.

    सीएम की कुर्सी मिलते ही बदल गयी थी रघुवर दास की भाषा

    ध्यान रहे कि सीएम के रुप में ताजपोशी के पहले तक रघुवर दास को झारखंड की सियासत में कोई बड़ा चेहरा नहीं माना जाता था, लेकिन जैसे ही सिर पर पीएम मोदी की कृपा दृष्टि और अमित शाह का आशीर्वाद मिला, उनकी गिनती झारखंड के सबसे कद्दावर नेताओं में की जाने लगी. लेकिन चुनावी समर में यह कृपा दृष्टि किसी काम का नहीं रहा. एक सीएम के रुप में वह सिर्फ अपनी पार्टी की नया ही नहीं डूबायें, बल्कि खुद जमशेदपुर पूर्व विधान सभा से अपनी सीट भी गंवा बैठें.

    जिस रघुवर को बारुद-तोप समझ रही थी केन्द्रीय भाजपा, झारखंड के सियासी पिच पर वह ढेर होता गया

    साफ था कि पिछले करीबन आठ वर्षों से जिस रघुवर को झारखंड भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व के दवाब में बारुद-तोप मान कर ढो रही थी, उसकी सामाजिक पकड़ नदारद थी, साथ ही कई बार अपने हठीले स्वभाव और बड़बोले बयान से पार्टी के सामने मुसीबत खड़े करते नजर आ रहे थें.

    आजसू से अलग होकर चुनाव लड़ने का फैसला रघुवर का ही था

    ध्यान रहे कि आजसू को किनारा कर अपने चुनावी समर में उतरने का फैसला रघुवर दास का ही था, जानकारों का मानना है कि सीएम की कुर्सी मिलते ही रघुवर दास की भाषा और कार्यशैली पूरी तरह बदल चुकी थी, उन्हे इस बात का बेहद गर्व था कि झारखंड की सियासत में सिर्फ उनके सिर पर ही पीएम मोदी का आशीर्वाद है, और धीरे-धीरे यह गर्व अंहकार की ओर भी बढ़ने लगा था. जिसकी अंतिम परिणति खुद अपने विधान सभा क्षेत्र में हार के साथ हुई. सीएम की कुर्सी पर रहते हुए भी वह अपने ही एक पूर्व सहयोगी और मंत्री सरयू राय के हाथों बूरी तरह पराजित हो गयें.  

     


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