रांची : मुर्दाघर के बेनाम चेहरे! जब मौत के बाद भी नहीं मिला अपनों का साथ, देखिये तब कैसे उठा समाज का हाथ

    रांची : मुर्दाघर के बेनाम चेहरे! जब मौत के बाद भी नहीं मिला अपनों का साथ, देखिये तब कैसे उठा समाज का हाथ

    Ranchi- कहा जाता है कि मौत के बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है, सामाजिक विभेद और उंच-नीच की सारी खाइयां टूट जाती है, अमीर हो या गरीब सबों को खाली हाथ ही इस दुनिया से रुखस्त होना पड़ता है. जिंदगी भर की जद्दोजहद और झूठ-सच की करतूत के बाद जिन उपलब्धियों पर गर्व किया जाता है. विदाई की उस बेला में वह उपलब्धियां भी एक भार नजर आने लगती है. लेकिन सब कुछ त्याग कर भी इतनी तो आशा की जाती है कि विदाई की इस बेला में कम से कम कफन का एक टूकड़ा मिल जाये और अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार शव का सम्मानपूर्ण दाह संस्कार कर कर दिया जाय.

    लेकिन हमारे बीच कुछ अभाग्ये ऐसे ही होते हैं, जिन्हे अंतिम समय में दो गज कफन भी नहीं मिल पाता, अपने परिजनों को आंख भर कर देखने का सौभाग्य भी नहीं मिल पाता.  

    राजधानी रांची का हाल

    यदि हम बात सिर्फ राजधानी रांची की करें तो पिछले पांच वर्षों में रिम्स रांची के मुर्दाघर में कुल 1012 लावारिश लाश लाये गयें, इसमें से कुल 15 फीसदी यानि कुल 155 लोगों की मौत महज इसलिए हो गयी कि ठंड की मार से बचने के लिए उनके शरीर पर कोई कपड़ा नहीं था, पूस की उस कनकनाती रात में उनके सिर पर कोई छत नहीं था, पेट की आग जो होगी, वह तो होगी ही. यदि इन अभाग्यों का कोई परिजन भी होगा, तब समझा जा सकता है कि उनकी आर्थिक हैसियत क्या रही होगी, बहुत संभव है कि वह मन मार कर साथ छोड़ चुके हों. हालांकि इसमें में भी उनकी कोई अमानवीयता नहीं दिखती. बल्कि जिन किस्तों में हमने उनके हिस्से गरीबी और वंचना लिखी है, वह तो उसी संत्रास के मारे अभाग्ये हैं. और जो ठंड से बच गये, वह भी बच कहां सकें, आंकड़े कहते हैं कि इन लाशों में 20 फीसदी वैसे लोग हैं, जिनकी मौत भूख से हो गयी. यह भूख कोई एक दिन की नहीं थी, यह गरीबी और भूख तो इनके हिस्से में पुश्तैनी संपत्ति के रुप में मिली थी, उनका कसूर मात्र इतना था इसे अपनी नियती मान कर जिंदगी भर बड़ी शान से ढोते रहें.

    सड़क पर बेतहाशा दौड़ती आलीशान-चमचमाती गाड़ियां और रेल की पटरियों पर नाचती ट्रेन 

    इसके साथ ही इस आंकड़े का चालीस फीसदी हिस्सा हमारे विकास की चकाचौंध का भी है, सड़क पर बेतहाशा दौड़ती आलीशान-चमचमाती गाड़ियां और रेल की पटरियों पर नाचती ट्रेनों से इनका सामना हो गया था, हालांकि गलती इनकी ही थी. जबकि 15 फीसदी वे लोग थें, जिन्हे हम हर दिन अपने ऑफिस के लिए निकलते और सब्जी लेकर घर लौटते समय राजधानी की सड़कों और फूटपाथों पर बीमारी की अवस्था में तड़पते हुए देखते हैं.

    हालांकि यह सब कुछ महज आंकड़ें है, और इन आंकड़ों की अपनी जादूगरी भी है, कई जरुरी नहीं है कि हर मौत मुर्दाघर ही पहुंच जाय, कई बार समाज का साथ मिलता भी और किसी तरह उनके अंतिम संस्कार का जुगाड़ कर दिया जाता है, जी हां, आपने सही सुना जुगाड़. लेकिन वह भी कुछ कम नहीं होता.

    हालांकि राजधानी रांची में सक्रिय एक सामाजिक संस्था ‘मुक्ति संस्था’ के द्वारा हर तीन चार माह में 20 से 40 लाशों का संस्कार किया जाता है. इसके संस्थापक प्रवीण लोहिया बताते कहते हैं कि उनकी संस्था के द्वारा 2014 से अब तक कुल 1576 लावारिश शवों का अंतिम संस्कार किया गया है.


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