जानिए झारखंड की लेडी सिंघम तदाशा मिश्रा के बारे में, जिनके नाम से नक्सलियों में है खौफ, रिटारमेंट से एक दिन पहले बनी झारखंड की नियमित DGP


टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : कहते हैं कि असली पहचान पद से नहीं, बल्कि कर्म से बनती है. झारखंड पुलिस को अपनी पहली नियमित महिला पुलिस महानिदेशक (DGP) देने वाली सीनियर आईपीएस अधिकारी तदाशा मिश्रा ने इस कहावत को सच कर दिखाया है. सख़्त प्रशासनिक निर्णयों, अनुशासन और बेख़ौफ कार्यशैली के कारण “लेडी सिंघम” के नाम से मशहूर तदाशा मिश्रा को सेवानिवृत्ति से महज़ एक दिन पहले राज्य की नियमित DGP नियुक्त किया गया. यह नियुक्ति न सिर्फ़ ऐतिहासिक है, बल्कि उन तमाम महिला अधिकारियों के लिए प्रेरणा भी है जो चुनौतीपूर्ण सेवाओं में नेतृत्व की भूमिका निभाने का सपना देखती हैं. झारखंड के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक (DGP), IPS अधिकारी अनुराग गुप्ता के वॉलंटरी रिटायरमेंट लेने के बाद राज्य सरकार ने 6 नवंबर, 2025 को तदाशा मिश्रा को कार्यवाहक DGP नियुक्त किया. खास बात यह है कि तदाशा मिश्रा 31 दिसंबर, 2025 को रिटायर होने वाली थीं, लेकिन उनके रिटायरमेंट से ठीक एक दिन पहले सरकार ने यह अहम फैसला लिया और उन्हें DGP के स्थायी पद पर नियुक्त कर दिया.
कठिन हालातों में मज़बूत नेतृत्व
अपने लंबे पुलिस करियर में तदाशा मिश्रा ने नक्सल प्रभावित इलाकों से लेकर शहरी अपराध नियंत्रण तक कई अहम ज़िम्मेदारियाँ निभाईं. उनके नेतृत्व में कानून-व्यवस्था को लेकर “ज़ीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाई गई, वहीं पुलिस-जन संवाद को भी प्राथमिकता दी गई. अपराध नियंत्रण, आंतरिक सुरक्षा और प्रशासनिक सुधारों को लेकर उनकी स्पष्ट सोच ने उन्हें एक निर्णायक अधिकारी के रूप में स्थापित किया.
उसके नाम से नक्सलियों में खौफ
तादाशा मिश्रा रेलवे में एडिशनल डायरेक्टर जनरल के तौर पर भी काम कर चुकी हैं और होम, जेल और आपदा प्रबंधन विभाग में स्पेशल सेक्रेटरी के तौर पर प्रशासनिक अनुभव हासिल किया है. नक्सल विरोधी अभियानों में उनकी भूमिका खास तौर पर उल्लेखनीय रही है. बोकारो में पुलिस सुपरिटेंडेंट के तौर पर काम करते हुए, उन्होंने झुमरा हिल और लुगु हिल के नक्सली गढ़ों में ऑपरेशन का नेतृत्व किया, जिससे नक्सलियों में डर पैदा हो गया. मूल रूप से ओडिशा की रहने वाली तादाशा मिश्रा ने 1994 में UPSC परीक्षा पास की और इंडियन पुलिस सर्विस (IPS) में शामिल हुईं. उन्हें शुरू में बिहार कैडर में तैनात किया गया था, लेकिन झारखंड बनने के बाद, वह झारखंड कैडर में ही रहीं.
जानिए क्यों कहा जाता है ‘लेडी सिंघम’?
कठोर निर्णय लेने की क्षमता, फील्ड में सक्रिय मौजूदगी और किसी भी दबाव के आगे न झुकने की छवि ने तदाशा मिश्रा को यह उपनाम दिलाया. अधिकारी हों या अपराधी सभी उनके अनुशासन और निष्पक्षता का लोहा मानते हैं.
महिला नेतृत्व के लिए मील का पत्थर
रिटायरमेंट से ठीक पहले DGP बनना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि योग्यता और समर्पण का सही समय कभी खत्म नहीं होता. उनकी नियुक्ति ने यह साबित किया कि महिला अधिकारी भी पुलिस जैसे चुनौतीपूर्ण विभाग में शीर्ष नेतृत्व देने में पूरी तरह सक्षम हैं.
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