संताल और आदिवासियों की राजनीति करने वाली पार्टी, कैसे बन गई राज्य की सबसे बड़ी पार्टी, जानिए JMM का पूरा इतिहास

    संताल और आदिवासियों की राजनीति करने वाली पार्टी, कैसे बन गई राज्य की सबसे बड़ी पार्टी, जानिए JMM का पूरा इतिहास

    रांची(RANCHI): वर्ष 2000, इतिहास के पन्नो में इसी साल भारत में तीन नए राज्यों का गठन हुआ, इन तीन राज्यों में एक राज्य झारखंड भी था. झारखंड राज्य का गठन आसान नहीं था. इसके लिए लंबे समय तक संघर्ष और इसके वजूद के लिए कई लड़ाईयां लड़ी गई, देश में सबसे उपेक्षित आदिवासियों और मूलवासियों के हक और अलग प्रांत की मांग के साथ लंबा संघर्ष हुआ. आंदोलन हुए कुछ आंदोलनकारियों को जेल तो कई की शहादत हुई. अंततः अबुआ राज्य झारखंड का उदय हुआ. इस कहानी में आज हम झारखंड से जुड़ी उन बातों की चर्चा करेंगे, जिससे ज्यादातर लोग अनजान है. झारखंड अलग राज्य की मांग आजादी के समय से चल रही थी. लेकिन साल 2000 में ये सपना साकार हुआ और भारत के नक्शे पर झारखंड को अपनी अलग पहचान मिली. राज्य अलग होने के बाद एक गाना खूब गुंज रहा था. “अलग भेल झारखंड अब खैया सकरकंद”. इस अलग झारखंड की मांग में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाली पार्टी थी, झारखंड मुक्ति मोर्चा(JMM). आज हम आपको जेएमएम पार्टी के इतिहास के बारे में बतायेंगे? पार्टी के स्थापना से लेकर वर्तमान राजनीति तक की बात करेंगे. 

    कैसे हुआ जेएमएम का गठन  
    भारत की आजादी के बाद बनी झारखंड पार्टी शुरू से ही अलग झारखंड की मांग करती थी. हालांकि, साल 1967 में झारखंड पार्टी में टूट हो गई और कई अलग-अलग पार्टियों में बिखर गई. इसमें से ही एक पार्टी निकली जिसका नाम था बिहार प्रोग्रेसिव हूल झारखंड पार्टी. इस पार्टी के नेता थे शिबु सोरेन. शिबु सोरेन ने जब पार्टी बनाई तब उन्हें अहसास हो गया कि अकेले के दम पर ये पार्टी नहीं चलने वाली. ऐसे में शिबु सोरेन, विनोद बिहारी महतो और कोमरेड डॉ एके रॉय ने मिलकर नई पार्टी 15 नवंबर 1972 को झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गठन किया. पार्टी का गठन भगवान बिरसा मुंडा के जयंती के दिन हुआ था. इस तीनों नेताओं के अलावा जो दो नाम और थे, वह था निर्मल महतो और टेक लाल महतो. ऐसा कहा जाता है कि साल 1971 में शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी ने लड़कर अलग और नया देश बांग्लादेश लिया था. वहीं, से झारखंड मुक्ति मोर्चा के नाम का ख्याल आया था. 

    मजदूरों के नेतागिरी से शुरू की राजनीति
    ऐसा कहा जाता है शिबु सोरेन पार्टी के गठन के बाद से ही खदान मजदूरों की नेतागिरी की. हालांकि, खदान में ज्यादातर मजदूर गैरआदिवासी थे. लेकिन जेएमएम पार्टी के गठन के बाद से उनकी लड़ाई थी बाहरी बनाम भितरी. पार्टी का नारा था झारखंडियों को झारखंड का पूरा अधिकार. लेकिन राज्य गठन के बाद भी पार्टी का कोई नेता पूरे पांच तक मुख्यमंत्री नहीं रह सका. इतना ही नहीं राज्य के पहले मुख्यमंत्री भी भाजपा से बाबुलाल मरांडी बने थे. 

    झामुमो की पूरी राजनीति समझिये
    दरअसल, झारखंड मुक्ति मोर्चा जब अस्तित्व में आई तब इसे संथालों की पार्टी कहा जाता था. आपको बता दें कि संथाल जनजाति झारखंड के आदिवासी समुदाय की सबसे बड़ी आबादी है. वहीं, संथाल परगना को झारखंड के राजनीति का केंद्र बिंदु भी कहा जाता है. लेकिन समय के साथ-साथ जेएमएम ने अपने आप को सभी आदिवासियों समुदाय की पार्टी बना ली. हालांकि, ये करने में जेवीएम और आजसू चुक गई. 

    JMM से कब-कब कौन बने मुख्यमंत्री       
    झामुमो की ओर से पहली बार मुख्यमंत्री शिबु सोरेन बने थें. पहली बार शिबु सोरेन महज 10 दिन तक ही सीएम रह सके थें. 
    1.    शिबु सोरेन- 2 मार्च 2005 से 12 मार्च 2005 – 10 दिन 
    2.    शिबु सोरेन- 27 अगस्त 2008 से 19 जनवरी 2009 – 145 दिन
    3.    शिबु सोरेन- 30 दिसंबर 2009 से 1 जून 2010 - 153 दिन 
    4.    हेमंत सोरेन- 13 जुलाई 2013 से 28 दिसंबर 2014 - 1 साल 168 दिन
    5.    हेमंत सोरेन- 29 दिसंबर 2019 से वर्तमान तक

    आपको बता दें कि झारखंड राज्य बनने के बाद किसी भी जेएमएम के नेता ने पांच का पूरा कार्यकाल बतौर मुख्यमंत्री पूरा नहीं किया है. अगर वर्तमान की हेमंत सोरेन सरकार अपना कार्यकाल पूरा करती है तो वो पार्टी के पहले नेता होंगे जो बतौर सीएम पहला कार्यकाल पूरा करेंगे.


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