पूजा के पहले तोहफा देने की तैयारी में हेमंत सरकार! कैबिनेट की बैठक में गरीबों के तीन कमरे का आवास और राज्यकर्मियों के महंगाई भत्ते पर लगा सकती है मुहर

    पूजा के पहले तोहफा देने की तैयारी में हेमंत सरकार! कैबिनेट की बैठक में गरीबों के तीन कमरे का आवास और राज्यकर्मियों के महंगाई भत्ते पर लगा सकती है मुहर

    Ranchi- 18 अक्टूबर को झारखंड कैबिनेट की बैठक में राज्य के आवासहीन आठ लाख गरीबों परिवारों के लिए तीन कमरों का आवास देने की घोषणा पर औपचारिक रुप से मुहर लग सकती है. इसके साथ ही राज्यकर्मियों की नजर भी कैबिनेट की इस बैठक पर लगी हुई है, माना जा रहा है कि कैबिनेट में राज्य कर्मियों के लिए महंगाई भत्ते का एलान किया जा सकता है.

    यहां बता दें कि झारखंड सरकार ने केन्द्र की दो कमरे की आवास योजना के बदले में झारखंड के गरीब परिवारों तीन कमरे का मकान देने का एलान किया है, लेकिन अब तक उस पर औपचारिक रुप से कैबिनेट की मुहर नहीं लगी है. माना जा रहा है कि कैबिनेट की इस बैठक में इस पर मुहर लगायी जा सकती है.

    करीबन आठ लाख परिवारों को होगा इसका लाभ

    ध्यान रहे कि झारखंड के करीबन आठ लाख परिवारों के द्वारा आवास योजना के तहत आवेदन दिया गया है, लेकिन हेमंत सरकार का दावा है कि केन्द्र इन गरीबों को आवास देने को तैयार नहीं है. जिसके कारण सभी आवेदन संबधित मुखिया और ग्राम प्रधान के पास लंबित पड़े हैं. केन्द्र की इस रवैये से लाचार होकर राज्य सरकार ने अपने संसाधनों के बल दो के बदले तीन कमरों का आवास देने का एलान किया है.

    केन्द्र सरकार पर लगातार हमलावर है सीएम हेमंत

    यहां बता दें कि ईडी के समन के बाद सीएम हेमंत लगातार केन्द्र सरकार और भाजपा पर हमलावर है. उनके द्वारा दावा किया जा रहा है कि राज्य के आदिवासी-मूलवासी और वंचित परिवारों के हक में जो फैसले लिये जा रहे हैं, जिस प्रकार से हर वृद्ध और विधवा को पेंशन दिया जा रहा है, गरीब परिवार के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने का  फैसला किया गया है, राज्य के शिक्षा  व्यवस्था में सुधार के लिए जिस प्रकार से मॉडल स्कूल और स्कूल ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना की जा रही है, लगातार नियुक्तियां निकाल युवाओं को रोजगार दिया जा रहा है, उससे केन्द्र और भाजपा परेशान हैं, यही कारण है कि उन पर तमाम केन्द्रीय एजेंसियों को लगा दिया गया है, ताकि राज्य की सरकार गरीब, आदिवासी-मूलवासियों को हित में कोई फैसला नहीं ले सकें और वे आजादी के 75 वर्ष बाद भी दोयम जिंदगी जीते रहें.


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