तेलंगाना में टनल हादसे के बाद डरे-सहमे गुमला के 150 मजदूरों ने काम करने से किया इनकार, कहा- कंपनी जबरन भेज रही सुरंग के अंदर

    तेलंगाना में टनल हादसे के बाद डरे-सहमे गुमला के 150 मजदूरों ने काम करने से किया इनकार, कहा- कंपनी जबरन भेज रही सुरंग के अंदर

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : तेलंगाना में निर्माणाधीन श्रीशैलम सुरंग में लगभग 14 किमी अंदर छत का एक हिस्सा अचानक धंस जाने से गुमला के चार मजदूर करीब 85 घंटे से फंसे हुए हैं. इन्हें निकालने के लिए स्थानीय प्रशासन और एनडीआरएफ की टीम लगातार जुटी हुई है, लेकिन घटना के बाद से अब तक मजदूरों का कोई सुराग नहीं मिल पाया है.

    इस हादसे के बाद कंपनी में काम कर रहे गुमला जिले के बासुदेव साहू, सुदामा साहू, निर्मल साहू, बुधराम साहू, फगुवा साहू, मधुसूदन साहू,महावीर उरांव घुरन गोप, कुंदन साहू,बिरया उरांव, बिक्रम साहू, दिनेश साहू, अरुण साहू, सोनू साहू, इंद्रजीत साहू, प्रदीप साहू, विवेक साहू, शंकर साहू, मांडू उरांव और रामदास उरांव सहित गुमला जिले के लगभग 150 मजदूर डरे हुए हैं. सूचना है कि मंगलवार की सुबह से उन्होंने काम करने से इनकार कर दिया है. इन मजदूरों ने बताया कि कंपनी के अधिकारी जबरन उन्हें सुरंग के अंदर काम करने के लिए बाध्य कर रहे हैं. विरोध करने पर गाली-गलौज और धमकी दी जा रही है.

    कुछ मजदूरों ने आरोप लगाया कि कंपनी के अधिकारियों द्वारा उन्हें मारपीट करने की धमकी भी दी जा रही है. सिसई इलाके के मजदूरों ने भी बताया कि उन्हे पिछले तीन महीनों से मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया है, जिससे मजदूर खाने-पीने तक के लिए मोहताज हो गए हैं और किसी तरह एक-दूसरे के सहयोग से अपना पेट भर रहे हैं. हादसे के बाद मजदूरों ने खुद ही सुरंग में घुसकर मलबा हटाने की कोशिश की थी, लेकिन कंपनी के लोग वहां से भाग खड़े हुए. काफी देर बाद पुलिस और प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद कंपनी के अधिकारी मौके पर पहुंचे और मलबे में दबे मजदूरों को खोजने का प्रयास किया. बाद में सरकार की पहल पर एनडीआरएफ की टीम बुलाई गई, जो अब तक रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही है. मजदूरों का आरोप है कि अगर कंपनी ने समय पर बचाव कार्य शुरू किया होता, तो उनके साथी अब तक सुरक्षित बाहर आ जाते.

    मजदूरों ने यह भी बताया कि सुरंग के अंदर सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए गए थे, जिससे यह बड़ा हादसा हुआ. मजदूरों ने झारखंड सरकार से मांग की है कि कंपनी से उनके तीन महीने की बकाया मजदूरी दिलाई जाए, ताकि वे अपने गांव लौटकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें. उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी वे अपनी मजदूरी की मांग करते है कंपनी के लोग उन्हें धमकाकर चुप करा देते हैं.


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