जातिगत जनगणना के जोर से झारखंड में भी वजूद बनने की जुगत में जेडीयू, विधानसभा चुनाव में परचम लहराने की ख्वाहिश

    जातिगत जनगणना के जोर से झारखंड में भी वजूद बनने की जुगत में जेडीयू, विधानसभा चुनाव में परचम लहराने की ख्वाहिश

    टीएनपी डेस्क(Tnp desk):-सियासत में विचारधारा और फॉर्मूला एक ऐसा अस्त्र और शस्त्र माना जाता है. जिससे जनता के सामने पेश करके वोट बटोरने की कसरत की जाती रही है. मोदी मैजिक के बीच बिहार में जातीय जनगणना का मास्टरस्ट्रोक चल कर नीतीश कुमार ने इस चुनावी मौसम में सियासत को ही एक नया मोड़ दे दिया. लोकसभा चुनाव से पहले इस चाल से भाजपा भी दंग रह गई और इसकी काट ढूंढने लगी.

    झारखंड में वजूद बनाने की जुगत में जेडीयू

    अब इसी के बालबूते जेडीयू झारखंड में अपना पैठ और जमीन तलाश रही है. लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में उसकी हसरत एकबार फिर संगठन को जिंदा करने और जेडीयू को अपना स्थान बनाने की है. यहां बिहार की तरह निशाने पर पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित वोटर है. जिसके सहारे चुनवी रण जीतने की जुगत लगायी जा रही है. जेडीयू की नजर लोकसभा में हाजरीबाग सीट पर भी लगी हुई है. लेकिन, इस पर अंतिम फैसला इंडिया गठबंधन ही लेगा.

    सियासत की समझ और यकायक अपनी चाल से विरोधियों को चित करने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद इसकी निगेहबानी कर रहे हैं. प्रदेश टीम के कई सक्रिए नेताओं के संग पटना में होना, इसकी बानगी है. प्रदेश अध्यक्ष खीरु महतो को जदयू से राज्यसभा में भेजना इसी की एक कड़ी है.

    एक समय थे जेडीयू के 11 विधायक  

    एक समय था कि जल, जंगल और जमीन के इस प्रदेश में जेडीयू के 11 विधायक थे. अपना वोट बैंक और जनाधार था. लेकिन, आज एक भी नहीं है. संगठन के कमजोर होने से इसका वजूद भी अहिस्ते-अहिस्ते खिसकता और दरकता गया. इसकी भरपाई लंबे वक्त तक नहीं हो सकी, सिर्फ जेडीयू नाम रह गया था. झारखंड में उसकी जमीन बेजार और उजड़ी हुई थी. इसी वजूद को दोबारा हासिल करने के लिए जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह झारखंड दौरा करके इस सगठन को दोबारा ख़ड़ा करने और इसका विस्तार देने की कवायद में जोर-शोर से लगे हुए हैं.

    कुर्मी, कुशवाहा वोट बैंक पर नजर

    जनता दल यूनाइटेड की कोशिश झारखंड में ज्यादा ज्यादा आबादी वाले कुर्मी, कुशवाहा और पिछड़ी जातियों पर नजर टिकाए हुए है. इससे जुड़े नेताओं को लगातार संगठन में जोड़ा जा रहा है. विधानसभा चुनाव के नजदीक आते-आते इस पर काम ओर तेजी से देखने को मिलेगा. अभी हर महीने जेडीयू के प्रदेश प्रभारी और नीतीश सरकार के मंत्री अशोक कुमार यहां आकर संगठनात्मक कामों का जायजा लेते हैं. जनवरी महीने में नीतीश कुमार भी इसी योजना के तहत आने वाले हैं.

    निशाने पर भाजपा और आजसू

    जेडीयू के जातिय समकीरण के जरिए जो तूफान झारखंड में उठाना चाहती है. उसकी आंधी में भाजपा और आजसू को उड़ाने का सारा खेल रचा जा रहा है. प्रदेश में भाजपा और आजसू का गठबंधन है. दोनों दल को ये मालूम है कि एक भी अगर एक दूसरे से छिटके तो खामियाजा दोनों को भुगतना पड़ेगा. इनका अटूट रहना ही दोनों के लिए साजगार साबित होगा. आजसू अध्यक्ष सुदेश महतो का कुर्मी मतदाताओं पर अच्छी पकड़ रखते हैं. लिहाजा, इस वोटबैंक में सेंधमारी करने के फिराक में जेडीयू की पहली प्राथमिकता होगी.

    हकीकत की जमीन पर अगर लौटे, चिजों को गहराई से समझ तो बिहार और झारखंड की सियासत में अंतर है. यहां नीतीश का करिश्मा बिहार की तरह ही चलेगा, ये सब सोचना और कहना अभी जल्दबाजी होगी. बेशक ओबीसी और दलित वोटबैंक पर जेडीयू की नजर बनी हुई हैं. पार्टी का एक वक्त झारखंड में अपना वोटबैंक भी था. लेकिन, एकबार फिर उसे समटेने और वापस लाने की उनकी कोशिश कितनी रंग लायेगी. उनका संगठन का विस्तर कितना हो पाता है. जनता उनकी विचारधारा से कितना जुड़ती है, और समर्थन करके बूथों पर वोट डालेगी. ये आने वाले समय में ही तय करेगा.  


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