कंपकंपाती सर्द में सड़क पर गरीब ठिठुरने को मजबूर, रैन बसेरा में भी नहीं मिल रही जगह

    कंपकंपाती सर्द में सड़क पर गरीब ठिठुरने को मजबूर,  रैन बसेरा में भी नहीं मिल रही जगह

    रांची (RANCHI) नये साल का शुरुआत होते ही शीतलहर का कहर जारी है. कड़ाके की ठंड से इन दिनों जनजीवन परेशान हैं. आलं यह है कि लोग गरम कपड़ों में भी ठिठुर रहे हैं. वहीं गरीब और विवश लोग सड़क पर ही सोने को मजबूर हैं. हाड़ कपकपाती ठंड में उन्हें सिर छुपाने के लिए जगह नहीं है. ये लोग सड़क किनारे, रेलवे स्टेशन, और मंदिर की सीढ़ियों को अपना ठिकाना बनाते हैं. इन सब जगहों पर सोकर इन्हें अपना जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है. शहर में रैन बसेरा में भी जगह नहीं मिल रहा है. रांची नगर निगम की ओर से शहर में 10 रैन बसेरा संचालित हो रहे हैं. कुल 200 लोगों की रात में रुकने की क्षमता है. पिछले पांच वर्षों में  नगर निगम के द्वारा एक ही रैन बसेरा बनाया गया है. 

    रैन बसेरा में सोने वालों की बढ़ी संख्या 

    अखबारों के रिर्पोट के मुताबिक़  राजधानी रांची में 2020 में 2000 लोग सड़क पर हर दिन गुजारते थे.  यह आंकड़ा कोरोना काल में गिरकर 600 से 700 पहुंच गया था. कोरोना के बाद रोजी रोजगार के लिए काफी लोग रांची पहुंचे हैं. इनके पास रहने का आश्रय फिलहाल नहीं है. फिलहाल ढाई हजार लोग रांची के सड़कों पर रात बिताने को मजबूर हैं. रांची नगर निगम के दावा के मुताबिक रैन बसेरों में गद्दे, कंबल, और  बेड के इंतजाम हैं. निगरानी के लिए निगम ने 5 अधिकारियों की टीम भी बनाई है. इसके अलावा तकरीबन फील्ड स्टाफ भी लगाए गए हैं. कर्मियों के द्वारा हर दिन रात में निरीक्षण  भी किया जाता है.

    कचड़ा बिनने वाली युवतियां सड़क के किनारे सोने को विवश 

    कचड़ा बिनने वाली युवतियां रांची रेलवे स्टेशन, हटिया रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड के पास खुले आसमान के नीचे  सोने के लिए मजबूर हैं. सोने को विवश होकर स्टेशन के पास ही मजदूरी करने वाले लोग दिन भर काम करने के बाद आराम करने का उनका ठिकाना वही होता है. कूड़ा कचरा बीनने वाली युवतियां सड़क के किनारे सोने पर विवश है.


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