अब दीवार और पहाड़ बताएंगे 'ओल चिकी भाषा' का महत्व, कभी नहीं सुना, तो जानिए डिटेल्स

    अब दीवार और पहाड़ बताएंगे 'ओल चिकी भाषा' का महत्व, कभी नहीं सुना, तो जानिए डिटेल्स

    बोकारो (BOKARO) : ओल चिकी भाषा आदिवासियों की सबसे प्राचीन भाषा मानी जाती है. आदिवासी युवाओं ने अपनी संस्कृति और भाषा को बचाने ओर उसे प्रख्यात करने का बीड़ा उठाया है. इसके लिए युवा ओल चिकी भाषा को अब दीवारों में लिख कर उसे बचाने की कोशिश में जुटे हैं. 7 और 8 नवंबर को आदिवासियों का महा धर्म सम्मेलन राजकीय महा उत्सव के रूप में मनाया जाएगा. वहीं एक शिक्षकों और समाजसेवी की  टीम अपने भाषा संस्कृति को लेकर ओल चिकी भाषा का दीवाल लेखन शीला लेखन लगातार कर ओल चिकी भाषा के महत्व की महत्वता का बखान कर रहे हैं.

    दीवार बताएगा भाषा की महत्वता  

    युवाओं की माने तो अपनी भाषा संस्कृति को बचाने और अपने लोगों को इसकी जानकारी देने के लिए पूरे धर्मस्थल में ओलचिकी भाषा से दीवार और शिला के ऊपर ओल चिकी भाषा की महत्वता को बताया जा रहा है.

    पहाड़ों पर भी अभियान जारी

    आदिवासी समाज से आने वाले नीलमणि मुर्मू और रामकुमार सोरेन अपनी लिपि को मान्यता दिलाने और आदिवासियों को इस लिपि की जानकारी देने के लिए पहाड़ों पर अपनी टोली लेकर घूम रहे हैं. उनका कहना है कि हम लोग धनबाद और बोकारो की टीम के साथ अपनी लिपि को मान्यता दिलाने और प्राचीन लिपि को जिंदा रखने के लिए दीवार लेखन करने का काम कर रहे हैं, ताकि आदिवासियों को अपनी प्राचीन लिपि की जानकारी हो सकें और स्कोर सरकार से मान्यता दिला सकें.

    सराहनीय कोशिश 

    इस दौड़-भाग भारी ज़िंदगी में हम सब कहीं न कहीं अपनी संस्कृति और सभ्यता पीछे छोरते जा रहे हैं. लेकिन जैसे हमारे पूर्वजों हमें अपनी भाषा और संस्कृति सौफ कर गए, ठीक उसी तरह हमारी भी जिम्मेदारी है कि अपनी भाषा और संस्कृति को हम पीढ़ी-दरपीढ़ी आगे बढाएं, ना कि उसे विलुप्त होने की कगार में छोड़ दें. हालांकि झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है, लेकिन हम इस बात से मना नहीं कर सकते कि बीते सालों में यहां बाहरी परिेवेश ने अपना घर बना लिया है. ऐसे में आदिवासी युवाओं का अपनी प्रचीन भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाने की कोशिश सराहनीय काम है.


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