जानिए क्या है PESA , JPRA 2001 और P-PESA कानून, आखिर क्यों मचा है झारखंड में घमासान

    जानिए क्या है PESA , JPRA 2001 और P-PESA कानून, आखिर क्यों मचा है झारखंड में घमासान

    टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : पेसा कानून यानी कि पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल्ड एरियाज एक्ट (Panchayat Extension to Scheduled Areas (PESA)  Act), इन दिनों चर्चा में है. झारखंड में इस कानून की मांग लंबे समय से चली आ रही है. सब कुछ ठीक रहा तो झारखंड में जल्द ही पेसा कानून लागू हो सकती है. पंचायती राज विभाग की निदेशक निशा उरांव के अनुसार अब इसे कैबिनेट में भेजने की तैयारी चल रही है. राज्य के वरिष्ठ वकीलों से भी सलाह ली गई है और अब इसे अंतिम रूप दिया जा रहा है. इस बीच, "जेपीआरए 2001", "पी-पेसा" और "पेसा एक्ट 1996" के मुद्दों पर बहस चल रही है कि ये आखिर है क्या? ऐसे में आइए समझते हैं कि ये तीनों है किया और कैसे काम करता है.

    "पेसा एक्ट 1996":

    1996 में पंचायती राज व्यवस्था में अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार करते हुए पेसा कानून लाया गया था. सरल शब्दों में कहें तो इस कानून के तीन मुख्य बिंदु हैं- जल, जंगल और जमीन का अधिकार. इस कानून के जरिए जमीन के अधिकार को मजबूत किया गया है. इस जमीन के अधिकार के तहत आदिवासियों को मजबूत करने की बात कही गई है.

    जेपीआरए 2001:

    झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 की धारा 17(बी)(1) में प्रावधान है कि अनुसूचित क्षेत्रों में प्रत्येक ग्राम पंचायत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण जनसंख्या के आधार पर होगा. लेकिन अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण कुल सीटों की संख्या के आधे से कम नहीं होगा.

    पी-पेसा और पेसा में क्या है अंतर:

    आमतौर पर सरकार और उससे जुड़े गैर सरकारी संगठन इस कानून को पेसा, 1996 या पंचायत राज का अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार कहते हैं. लेकिन भारत सरकार द्वारा 24 दिसंबर 1996 को प्रकाशित राजपत्र में इसका पूरा नाम पी-पेसा यानी "पंचायतों के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996" है. इसके तहत पंचायतों के कुल 23 प्रावधानों को अपवादों और संशोधनों के अधीन अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तारित किया गया है. पी-पेसा, 1996 के तहत इसकी धाराओं 3, 4, 4(डी), 4(ओ), 4(एम) (i से vii) और धारा 5 के अनुपालन में नियम बनाना सरकार का संवैधानिक दायित्व है. धारा 5 के अनुसार नियम बनाने की समय सीमा एक वर्ष ही तय की गई थी.

    पी-पेसा पर अविभाजित बिहार का रुख

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि झारखंड गठन से पहले ही अविभाजित बिहार की तत्कालीन सरकार ने 6 मार्च 1998 को खान एवं भूतत्व विभाग, बिहार सरकार के उप सचिव के माध्यम से सभी प्रमंडलीय आयुक्तों को पी-पेसा, 1996 के प्रावधानों का हवाला देते हुए एक पत्र जारी किया था, जिसमें पेसा की धारा 4(के), 4(एल) के प्रावधानों का हवाला देते हुए बिहार लघु खनिज उपदान नियमावली, 1972 में संशोधन की बात कही गई थी. इसके तहत लघु खनिजों की नीलामी और खनन के लिए ग्राम सभा को अधिकृत किया गया था. लेकिन झारखंड गठन के बाद भी यह व्यवस्था यहां लागू नहीं हो पाई.

    JPRA 2001 बनाम पेसा 1996 का मसला

    झारखंड समेत देश के दस राज्य पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र वाले राज्य हैं और सभी नौ राज्यों में पेसा 1996 कानून के नियमों को राज्य पंचायत राज अधिनियम में शामिल किया गया है.

    झारखंड में यह कानून पंचायत राज अधिनियम में शामिल नहीं होगा, तो इसका क्रियान्वयन कहां होगा?

    केंद्र और राज्यों में पेसा कानून का नोडल विभाग पंचायत राज विभाग है और इसी विभाग ने इसे हर राज्य में लागू किया है.

    संसद ने 1996 में कानून तो बना दिया, लेकिन नियम नहीं बनाए. वन अधिकार अधिनियम 2006 की खासियत यह रही कि कानून के साथ-साथ 2008 और 2012 में नियम भी बनाए गए, लेकिन पेसा के मामले में केंद्र यह काम नहीं कर सका, इसलिए यह राज्यों के जिम्मे आ गया. कई लोगों का मानना ​​है कि झारखंड पंचायत राज अधिनियम 2001 के तहत इस कानून के नियमों को लागू नहीं किया जा सकता. पेसा एक केंद्रीय कानून है और 1996 में इसे लागू करते समय कहा गया था कि अगर राज्य एक साल के भीतर इसे लागू नहीं करते हैं, तो इसे स्वतः लागू माना जाएगा. पेसा को ज्यादातर राज्यों में दो-ढाई दशक बाद ही लागू किया गया, वह भी राज्य के विभिन्न कानूनों में संशोधन करने के बाद.

     

     


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