गरीब बेटियों के हौसले को पंख दे रहा कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, जानिए कैसे 

    गरीब बेटियों के हौसले को पंख दे रहा कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, जानिए कैसे 

    गुमला (GUMLA) : जिला में संचालित कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय आज बेटियों की पढ़ाई के लिए मिल का पत्थर साबित हो रहा है. इसके माध्यम से ना सिर्फ गरीब बेटियां अपनी पढ़ाई पूरी कर पा रही है, बल्कि ह्यूमन ट्रैफिकिंग का शिकार होने से भी बच रही है. वहीं डीसी सुशांत गौरव कस्तूरबा विद्यालय को और मजबूत करने को लेकर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं. 

    गरीब घर की बेटियों का हो रहा विकास

    ऐसे तो झारखंड ही नहीं देश के कई राज्यों में कस्तूरबा गांधी आवसीय विद्यालय संचालित हो रहा है. जहां पूरी तरह से आवासीय व्यवस्था में रखकर बेटियों को बेहतर तरीके से पढ़ाई करने का अवसर मिल रहा है. लेकिन झारखंड के गुमला जिला के लिए कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय एक वरदान साबित हो रहा है. दरअसल, गुमला एक ऐसा आदिवासी बहुल जिला है, जहां की एक बहुत बड़ी आबादी पूरी तरह से गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रही है. जिसके कारण ग्रामीण बेटियों की पढ़ाई प्राथमिक विद्यालय के बाद बंद हो जाती थी. शिक्षा के अभाव में बेटियां या तो गांव में काम करती है, ट्रेफिकिंग का शिकार होती है, या फिर कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी जाती है. लेकिन कस्तूरबा विद्यालय ने इन सारे कलकों को समाप्त कर दिया है. अब बेटियां केवल पढ़ाई कर रही है. इन बेटियों के माता पिता का मानना है कि यह विद्यालय नहीं होता तो उनके बच्चों की पढ़ाई अधर में रह जाती. 

    बेटियों के चेहरे पर रौनक

    वर्तमान की बात करें तो गुमला जिला के विभिन्न प्रखंडों में 12 कस्तूरबा विद्यालय संचालित हो रहा है. जहां हजारों बेटियां बेहतर माहौल में पढ़ाई कर रही है. विद्यालय बच्चियों को न केवल शिक्षा दे रहा, बल्कि उनका सारा खर्चा भी उठा रहा.  ऐसे में यहां पढ़ने वाली बेटियों ने राज्य स्तर पर अव्वल स्थान प्राप्त किया है. जिला के डीसी सुशांत गौरव ने भी इसे काफी गंभीरता से लिया है. जिसके बाद वे कस्तूरबा विद्यालय को पूरी तरह से संसाधनों से सम्पन्न करना चाहते है. ताकि जिला की कोई भी बेटी अब पढ़ाई से वंचित ना रहे. कल तक गरीबी के कारण जिला की कोई भी बेटी पढ़ाई नहीं कर पाती थी, परेशान रहती थी. लेकिन अब उनके चेहरे पर रौनक है. उनके पढ़ने की इच्छा अब पूरी हो रही है. 

    रिपोर्ट: गुमला ब्यूरो


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