हेमंत सोरेन के बाद अब बसंत भी घेरे में, राजभवन पर टिकीं सबकी निगाहें, जानिये विस्तार से  

    हेमंत सोरेन के बाद अब बसंत भी घेरे में, राजभवन पर टिकीं सबकी निगाहें, जानिये विस्तार से  

    रांची (RANCHI): ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर तलवार लटकी ही थी, अब उनके छोटे भाई बसंत सोरेन (दुमका से झामुमो के विधायक) की विधायकी पर भी संशय के बादल छा चुके हैं. पहले हेमंत सोरेन के मामले को समझते हैं, फिर बसंत सोरेन की बात रकेंगे.

    राजभवन में अटका हेमंत का मामला

    हेमंत सोरेन पर रांची के अनगड़ा में 88 डिसमिल पत्थर माइनिंग लीज लेने का आरोप है. 10 फरवरी को पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के नेतृत्व में भाजपा के एक प्रतिनिधि मंडल ने मामले में हेमंत सोरेन की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी. कहा था कि सोरेन ने पद पर रहते हुए माइनिंग लीज ली है. यह लोक जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP) 1951 की धारा 9A का उल्लंघन है. राज्यपाल ने यह शिकायत चुनाव आयोग को भेज दी थी. आयोग ने राजभवन अपना मंतव्य भेज दिया है, अब राज्यपाल अपनी अनुशंसा आयोग को भेजेंगे. लेकिन पखवाड़ा बीत गया, इस बीच दिल्ली दौरा कर भी राज्यपाल लौट आए. लेकिन अबतक राजभवन से इस संबंध में कोई बात सामने नहीं आई है. लेकिन लगभग सभी ने मान लिया है कि हेमंत की विधायकी जाना तय है.

    हेमंत के समक्ष क्या है अब उपाय

    राज्यपाल अगर अभी और देरी करते हैं तो हेमंत सोरेन के पास क्या-क्या उपाय हैं, जो संविधान के दायरे में किये जा सकते हैं. संविधान विशेषज्ञ डॉ. सुभाष कश्यप के मुताबिक इस संबंध में निर्णय लेने के लिए राज्यपाल के लिए समय की कोई बाध्यता नहीं है. हालांकि राज्यपाल को उचित समय के अंदर ही इस पर अपना निर्णय दे देना चाहिए. यदि राज्यपाल ऐसा नहीं करते हैं तो हेमंत सोरेन अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकते हैं. वह हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं.

    बसंत का फैसला भी राज्यपाल ही करेंगे

    हेमंत और बसंत- दोनों भाई के मामले में कई बातें कॉमन हैं. दोनों पर आरोप भाजपा ने लगाया है. दोनों पर आरोप पत्थर खदान लीज लेने का है. दोनों पर इल्ज़ाम भाजपा ने लगाए हैं। बसंत दुमका से झामुमो विधायक है. इनका मामला भी निर्वाचन आयोग में चल रहा था. बसंत सोरेन ने आयोग को अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि उन्होंने कोई तथ्य नहीं छिपाया है. चुनाव के दौरान सौंपे गये शपथ पत्र में भी इसका उल्लेख है,  22 अगस्त को ही सुनवाई मुकम्मल कर आयोग ने फैसला सुरक्षित रख लिया था. सीलबंद लिफाफे में आयोग ने अपना मंतव्य भी राज्यपाल को भेज दिया, जो शुक्रवार शाम राजभवन पहुंचा. हालांकि कहा जा रहा है कि बसंत सोरेन के खनन कंपनी में साझेदार होने के आरोपों के संबंध में समुचित तथ्य नहीं मिले हैं. इस कारण आयोग ने फैसला राज्यपाल पर छोड़ा है.


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