धनबाद का बाजार भी तैयार,लोग भी त्योहारी मूड में, इस दिवाली खूब जमेगा रंग 

    धनबाद का बाजार भी तैयार,लोग भी त्योहारी मूड में, इस दिवाली खूब जमेगा रंग 

    धनबाद(DHANBAD): दीपों का त्योहार दीपावली. इस त्यौहार से सबको कुछ न कुछ उम्मीद होती है. दीया बेचने वाले भी पूंजी लगाते हैं कि कुछ आमदनी हो जाएगी. छोटे-छोटे सामान की अस्थाई दुकान लगाने वाले भी कुछ कमाने की सोच रखते हैं. बड़े-बड़े कारोबारी भी इसलिए पूंजी लगाते हैं कि उनकी आमदनी में और इजाफा होगी. यह एक ऐसा त्यौहार है कि सड़क के अगल-बगल अस्थाई दुकानें सज जाती हैं .दुकानों की अपनी वैरायटी होती है. चाक से बनने वाले दीए भी बाजार में कम नहीं उतरे हैं. घर और दुकान सजाने के लिए आकर्षक सामान भी जहां-तहां दिख रहे हैं. लग तो ऐसा रहा है जैसे सामान बिक्री के लिए नहीं ,बल्कि दुकानों को सजाने के लिए लगाया गया है.

    साफ सफाई रौशनी का त्योहार है दीपावली
     
    दीपावली रोशनी का त्यौहार है, साफ सफाई का त्यौहार है, इसके पीछे एक मकसद यही रहता है कि साल भर में जमी गंदगी को हटा लिया जाए और घरों को फिर नए ढंग से सजाया जाए. मान्यता के अनुसार घर को साफ सुथरा रहने से दीपावली के दिन लक्ष्मी विचरण करते हुए पधारती है और आशीष बरसाती हैं. अभी चारों ओर मिट्टी के दीये खरीदने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने की बात चल रही है. धनबाद के विधायक राज सिन्हा ने सवा लाख बांटने को ठानी है. और भी स्वयंसेवी संस्थाएं दीया बांटती हैं, बाजार भी इस मौके को भुनाने के लिए पूरी तैयारी किए हुए है.बैंक मोड़ चेंबर ऑफ कॉमर्स के महासचिव प्रमोद गोयल भी मानते हैं कि धनबाद के बाजारों में दिवाली के दिन या उससे पहले एक सौ करोड़ से अधिक के कारोबार होंगे.फिलहाल लोग अपने-अपने घरों की सजावट में जोर-शोर से लगे हुए हैं. 

    श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे

    पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के बाद जब वापस अयोध्या लौटे थे तो अयोध्यावासियों ने उनका स्वागत लाखों दीप जलाकर किया था. यह परंपरा आज भी कायम है. दीपावली  के दिन सभी घर दीयों से जगमग-जगमग रहते हैं. इस दिन मां लक्ष्मी  और भगवान श्री गणेश जी की पूजा-अर्चना की जाती है. माना जाता है कि घर को साफ-सुथरा रखने से इस दिन मां लक्ष्मी स्वयं घर पधारती हैं. इसलिए दिवाली के दिन हर कोने में दीएं जलने चाहिए. हालांकि, आजकल एक से बढ़कर एक रंग-बिरंगे बल्ब लगाने का चलन हैं लेकिन मिट्टी के दीयों का आज भी कोई जवाब नहीं हैं.


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