धनबाद में सब कुछ होने के बावजूद बहुत कुछ नहीं है ,जानिए धनबाद की  बदहाली की कहानी 

    धनबाद में सब कुछ होने के बावजूद बहुत कुछ नहीं है ,जानिए धनबाद की  बदहाली की कहानी 

    धनबाद(DHANBAD): झारखंड के पुराने और चर्चित शहर धनबाद की  बदहाली की कहानी सुन- जानकर आप भी चौंक जाएंगे.आर्थिक रूप से संपन्न इस कोयला नगरी में सब कुछ होने के बावजूद बहुत कुछ नहीं है. सुविधाओं के लिए यह शहर 66 साल से लगातार संघर्ष कर रहा है. इसके संघर्षों पर कब जा कर विराम लगेगा, यह कहना कठिन है. 66 साल के बुजुर्ग धनबाद की सड़कों पर केवल 16 प्रतिशत ही ड्रेनेज सिस्टम काम करता है. 

    1956 में मानभूम से कटकर धनबाद जिला बना था

    1956 में मानभूम से कटकर धनबाद जिला बना था, यानी धनबाद जिला के बने 66 साल हो गए. 1956 के पहले धनबाद एक चुनमुना और आकर्षक शहर था. सड़कों पर सिर्फ झाड़ू ही नहीं लगते थे बल्कि सड़के धोई भी जाती थी. लेकिन अब यह इतिहास की बातें हो गई है. हां ,कभी-कभी सड़कों पर धूल बटोरती मशीन दिख जाती है,वह भी चुनिंदा सड़कों पर. 

    1991 में धनबाद से कटकर बोकारो जिला बना

    1991 में धनबाद से कटकर बोकारो जिला बना. उसके बाद धनबाद का क्षेत्रफल कम गया. 2006 में नगर निगम बना, नगर निगम के बने भी 15 साल से अधिक हो गए, लेकिन अभी की अगर बात करें और उपलब्ध आंकड़े पर भरोसा करें तो  धनबाद की सड़कों पर केवल 16% ही ड्रेनेज सिस्टम है. सड़कों की लंबाई 243 किलोमीटर आंकी गई है. जबकि नालों की लंबाई केवल 40 किलोमीटर है. इतना ही नहीं, शहर में जितने भी नाले हैं ,लगभग सब खुले हुए हैं. नालों को ढक कर ड्रेनेज सिस्टम की व्यवस्था नहीं की गई है. यह हाल है 66 साल के बुजुर्ग धनबाद का. झारखंड राज्य भी अब अपने किशोरावस्था को पार कर जवानी की दहलीज पर पैर रख दिया है, बावजूद धनबाद पुराने ढर्रे पर ही चल रहा है .

    सीवरेज ड्रेनेज योजना के लिए 400 करोड़ों रुपए की मंजूरी

    अभी एक सुखद समाचार यह है कि शहर के सीवरेज ड्रेनेज योजना के लिए 400 करोड़ों रुपए की मंजूरी मिली है .कैबिनेट ने इसे पारित कर दिया  है. ड्रेनेज सिस्टम को ठीक करने के लिए जुड़को को  डीपीआर बनाने का आदेश दिया जा चुका है. इतना ही नहीं ,नालों के पानी को भी शुद्ध  कर नहाने धोने के  उपयोग में लाने के लिए वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बैठाने का निर्णय लिया गया है. यह प्लांट झरिया, धनबाद, कतरास और सिंदरी में प्रस्तावित है और यहां एस टीपी मशीन लगाने की योजना है. अब देखना होगा कि यह योजना जमीन पर किस हद तक उतर पाती है. क्योंकि पहले भी घोषणा हुई थी कि कोलियरी से निकलने वाले पीट वाटर को शुद्ध कर इसे उपयोग में लाया जाएगा ,लेकिन यह घोषणा सिर्फ कागज तक ही सीमित रह गई


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