बाल दिवस स्पेशल: गरीब कोयला चुनने वाले बच्चों के लिए ये है खास स्कूल, जहां ‘गरीबी भाग्य नहीं है, हम इसे बदल सकते हैं’ की दी जाती है शिक्षा

    बाल दिवस स्पेशल: गरीब कोयला चुनने वाले बच्चों के लिए ये है खास स्कूल, जहां ‘गरीबी भाग्य नहीं है, हम इसे बदल सकते हैं’ की दी जाती है शिक्षा

    धनबाद(DHANBAD): आज बाल दिवस है. आज आगे चलकर देश का भविष्य गढ़ने वालों का दिन है. शहर के स्कूलों में तो बड़े बड़े कार्यक्रम हो रहे हैं, लेकिन आज हम आपको कोयला क्षेत्र के उस स्कूल में लेकर चलेंगे, जहां बच्चे भी अपने माता-पिता के साथ कोयला चुनने जाते हैं और फिर समय निकालकर पढ़ाई करते हैं. सुनने में अजीब लगता होगा लेकिन है ये सौ फीसदी सच. जी हां,  वहां बच्चों को संस्कार की शिक्षा दी जाती है. किताबी ज्ञान भी उन्हें दिया जाता है. अभिभावकों को भी समझाया जाता है कि बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करें.  स्कूल चलता है कोलफील्ड चिल्ड्रन क्लासेज के नाम से.  इसके संस्थापक हैं पिनाकी राय. स्कूल में आत्मबल भी भरा जाता है. नारा होता है, गरीबी भाग्य नहीं है, इसे हम चाहे तो बदल सकते हैं. सूदखोर और साहूकार से दूरी बनाए रखें. जुआ और नशे को मार भगाए. घर के आस-पास सफाई रखें. बच्चों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करें. घर में झगड़ा ना करें, एक-दूसरे का सम्मान करें. इन सीख के अलावे अलग से किताबी शिक्षा भी बच्चों को दी जाती है. स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे कंप्यूटर फ्रेंडली होते हैं और वह बहुत कुछ करने का जज्बा लेकर कोयला चुनने के साथ-साथ स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं.

    बच्चों की मानसिकता में बदलाव लाना मकसद

    स्कूल के संस्थापक पिनाकी राय का मानना है कि उनका मकसद कोयला चुनने वाले बच्चों के माता-पिता की मानसिकता में बदलाव लाना है. कोयला खदानों के आसपास रहने वाले लोग कई तरह की सामाजिक जटिलताओं के बीच जीते हैं. लेकिन इन्हीं जटिलताओं के बीच रोशनी की किरण भी है. उस किरण तक पहुंचने के लिए बच्चों को प्रेरित करने का उनका प्रयास है. बाल दिवस पर स्कूल में कार्यक्रम भी होते हैं, आज भी हुए. शाम को स्कूल बैग आदि का वितरण हुआ. कोयला खदानों के आसपास रहने वाले की जिंदगी में अगर थोड़ा भी सुधार हुआ तो इस स्कूल की जितनी भी सराहना की जाए, कम है. यह बात अलग है कि अभी यह स्कूल बहुतों का ध्यान अपनी ओर नहीं खींच पाया है, लेकिन जिनके बच्चे कोयला चुनने के बाद समय निकाल कर पढ़ाई कर रहे हैं. वह तो इसी स्कूल को मंदिर मानकर इसकी पूजा करते हैं. देखना है यह स्कूल आगे चलकर अपने मकसद में कितना सफल हो पाता है और कितनों की जिंदगी सुधार पाता है. अभी तक एक सौ से अधिक बच्चों को शिक्षा देने का श्रेय स्कूल को जाता है. लक्ष्य है जदि तोर डाक सुने केउ ना आशे, तब एकला चालो रे.

    रिपोर्ट: शांभवी, धनबाद


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